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मदरसा शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण: आखिर आधुनिक प्रतिस्पर्धी दौर में केवल मजहबी ज्ञान से मुस्लिम वर्ग शेष समाज की बराबरी कैसे कर सकता है?


यह एक स्थापित सत्य है कि बीते कुछ वषों में जिस प्रकार की आतंकी घटनाएं कश्मीर, न्यूयॉर्क, लंदन, मैनचेस्टर, पेरिस, नीस, काबुल, लाहौर, ढाका आदि शहरों में हुई हैं वे लगभग सभी मजहबी जुनून और एक किस्म के जहरीले चिंतन से प्रेरित रही हैं। आखिर यह मानसिकता कहां पैदा होती है और इसका प्रचार-प्रसार करने वाले संस्थानों में मदरसों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है? इस प्रश्न पर विचार किया जाना आवश्यक है। मदरसा शिक्षा पद्धति मूलत: मजहब पर आधारित है। मदरसा आधारित तालीम की मूल अवधारणा में अपनी मजहबी मान्यताओं को सर्वश्रेष्ठ और अन्य मजहब के अनुयायियों को काफिर-कुफ्र घोषित करना निहित है। प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने वाला मूर्तिपूजक हिंदू, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध के साथ मुस्लिम समाज के भी कुछ वर्ग उनके लिए काफिर हैं। इस चिंतन के अनुसार काफिरों के पास केवल दो विकल्प होते हैं- या तो वे इस्लाम में मतांतरित हो जाएं या फिर मौत को स्वीकार करें। विश्व को दारुल-इस्लाम में परिवर्तित करना हर सच्चे अनुयायी का धार्मिक कर्तव्य माना जाता है। यही दर्शन बीती कई सदियों से वैश्विक शांति, मानवता और सामाजिक सौहार्द के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोधक बना हुआ है। पिछले दिनों न्यूयॉर्क में मैनहट्टन की सड़क पर निरपराध को कुचलने वाला आतंकी ट्रक ड्राइवर अल्लाह हू अकबर चिल्ला रहा था, जिसका शाब्दिक अर्थ अल्लाह सबसे बड़ा है। इस नारे का उद्घोष करते हुए निरपराध लोगों को मारने के पीछे की मानसिकता को बल देने में मदरसों में मिलने वाली मजहबी शिक्षा का बहुत बड़ा हाथ माना जाता है। उक्त हमला उसी लोन वूल्फ (आतंकी हमले को अकेले अंजाम देने वाला) का ही एक प्रकार था। दुनिया ऐसे हमले मैनहट्टन से पहले 14 जुलाई 2016- नीस, 19 दिसंबर 2016- बर्लिन, 22 मार्च 2017- लंदन, 7 अप्रैल 2017- स्टॉकहोम, 17 अगस्त 2017- बार्सिलोना समेत अन्य शहरों में देख चुकी है।1उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार का प्रदेश के मदरसों के संबंध में 30 अक्टूबर को यह निर्णय सामने आया कि सरकारी सहायता प्राप्त इस्लामी शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी और यूपी बोर्ड का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा। इसके तहत गणित और विज्ञान आदि आधुनिक विषयों को मदरसों में अनिवार्य करने की योजना है। इस बारे में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार का उद्देश्य मदरसों को आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करके उनमें पढ़ने वाले छात्रों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। इसके बावजूद कुछ कट्टरपंथी तत्व योगी सरकार की इस योजना का विरोध कर रहे हैं। आखिर जब 2010 में पारित शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत देश के हर बच्चे को मौलिक शिक्षा पाने का अधिकार है और यह सुनिश्चित करना राज्य सरकारों का दायित्व है तो फिर उत्तर प्रदेश सरकार के निर्णय पर संदेह क्यों? यदि कानूनी पक्ष को छोड़ भी दिया जाए तो आज के आधुनिक और प्रतिस्पर्धा से भरे दौर में केवल वेद-पुराण, कुरान-हदीस या फिर बाइबल की शिक्षा देकर हम कैसी पीढ़ी विकसित करना चाहते हैं? 1 आम तौर पर यह एक धारणा है कि कंप्यूटर, गणित, विज्ञान, अंग्रेजी आदि आधुनिक विषयों की शिक्षा से मजहबी कट्टरता और आतंकवाद के दानव का खात्मा किया जा सकता है और बच्चों के भीतर समाज के प्रति संवेदनशीलता और निष्ठा जैसे गुणों का विकास भी किया जा सकता है,लेकिन यदि वास्तव में ऐसा होता तो 2001 के 9/11 आतंकी हमले में कंप्यूटर शिक्षित, अंग्रेजी बोलने वाले और आधुनिक विषयों में स्नातक या फिर परास्नातक रहे युवा क्यों शामिल हुए? इस हमले को अंजाम देने वाले ज्यादातर हमलावर प्लेन उड़ाने में दक्ष थे और उन्हें यह दक्षता आधुनिक शिक्षा के कारण ही हासिल हो सकी। ऐसे में मदरसों के पाठ्यक्रमों को आधुनिक बनाने या उनमें कंप्यूटर शिक्षा प्रारंभ करना उसी कट्टरपंथी मानसिकता को और खुराक देकर बुलंद करने जैसा है जिसकी आधारशिला स्वयं दुनिया के तमाम मदरसों में तैयार होती है। योगी सरकार की मदरसों में आधुनिक विषय पढ़ाए जाने की योजना का मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा विरोध चौंकाने वाला नहीं, अपितु स्वाभाविक ही है, क्योंकि कट्टरपंथी तत्व अपने समुदाय में किसी भी तरह के सुधार सहित कुरान, शरीयत और उनके जरिये स्थापित मजहबी मान्यताओं पर किसी भी तरह का प्रश्न उठाना या परिवर्तन करना या फिर उसकी मांग करना इस्लाम पर आक्रमण समझते हैं। क्या मजहबी शिक्षा देने तक सीमित अधिकतर मदरसों में आधुनिक विषयों को शामिल करके वहां के छात्रों के चिंतन में बदलाव लाना संभव है? यदि मदरसों में अंग्रेजी, विज्ञान आदि आधुनिक विषयों को शामिल करने से कट्टर इस्लामी मानसिकता वाकई बदल सकती तो निश्चय ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय भारत को खंडित करने के प्रपंच में प्रमुख भूमिका नहीं निभाता। मदरसा शिक्षा प्रणाली की अन्य खामियों में से सबसे बड़ी खामी यह है कि यहां के छात्रों का संपर्क साधारणत: केवल मुसलमान बच्चों और अध्यापकों के साथ ही होता है। प्रारंभिक परवरिश में ही बाहरी दुनिया से कटाव उन्हें अन्य समुदाय के आचार-विचार और जीवन दर्शन से अपरिचित रखता है। यदि मुस्लिम बच्चे केवल अपने समुदाय के बच्चों और मौलवी के ही संपर्क में रहेंगे तो स्वाभाविक तौर पर उनका दृष्टिकोण, वेशभूषा, भाषा, देश के इतिहास के बारे में उनकी समझ और सपने भी शेष समाज से भिन्न होंगे। यही दूरियां अक्सर कई गलतफहमियों को जन्म देने का कारण बनती हैं।1 नि:संदेह भारत विविधताओं का देश है और यहां के नागरिकों की कई पहचान हो सकती है, किंतु उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी राष्ट्रीयता-भारतीयता से है। जब इसी पहचान की अवहेलना होगी तो कई विसंगतियों का पैदा होना भी स्वाभाविक है। आवश्यकता इस बात की होनी चाहिए कि सभी बच्चे साधारण विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करें, जिससे उनकी राष्ट्रीयता समान हो सके। बच्चों को उसी स्कूल में आधुनिक विषयों के साथ-साथ सभी मतों की नैतिक शिक्षा हेतु अलग से व्यवस्था की जाए ताकि वे अन्य मजहबों और उनके मान-बिंदुओं का आदर कर सकें। साथ ही दूसरों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना सीख सकें। आज मुस्लिम समुदाय की जो स्थिति है उसके लिए आखिर कौन जिम्मेदार हैं? मुस्लिम शासनकाल में अरबी-फारसी को भले ही महत्व दिया गया हो, किंतु आधुनिक युग के प्रतिस्पर्धात्मक दौर में केवल मजहबी ज्ञान से मुस्लिम समाज शेष समाज के साथ-साथ चलने की कैसे कल्पना कर सकता है?1(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य एवं स्तंभकार हैं)

मदरसा शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण: आखिर आधुनिक प्रतिस्पर्धी दौर में केवल मजहबी ज्ञान से मुस्लिम वर्ग शेष समाज की बराबरी कैसे कर सकता है? Rating: 4.5 Diposkan Oleh: amit gangwar

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