01 August 2020

नई शिक्षा नीति में 5वीं तक मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई से उपजेगी समझ : रमेश निशंक


नई शिक्षा नीति में 5वीं तक मातृभाषा में पढ़ाई की बात की गई है, इसे कैसे लागू किया जाएगा? खासकर जब अंग्रेजी मीडियम स्कूलों की संख्या बड़ी है?

छोटे बच्चे मातृभाषा में चीजों को जल्दी सीखते और समझते हैं। इसीलिए नई शिक्षा नीति में कहा गया है कि कम से कम कक्षा पांच तक और अगर संभव हो तो कक्षा आठ व उसके बाद भी शिक्षा का माध्यम मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा होगी। अगर संभव हो तो कक्षा आठ के बाद भी स्थानीय भाषा की एक अन्य भाषा के रूप में पढ़ाई जारी रखी जाएगी। ऐसा सरकारी व निजी दोनों प्रकार के स्कूलों द्वारा किया जाएगा। विज्ञान सहित अन्य उच्च गुणवत्ता वाली पाठ्य पुस्तकें मातृभाषा या स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराई जाएंगी। शुरुआती शिक्षा में भी बच्चों को अलग-अलग भाषाएं पढ़ाई जाएंगी, लेकिन विशेष जोर मातृभाषा पर होगा। कक्षा तीन तक लिखना और पढ़ना मातृभाषा में सिखाया जाएगा। इसके बाद से दूसरी भाषाओं में लिखना और पढ़ना सिखाकर कौशल विकास किया जाएगा।


5वीं के बाद क्या इंग्लिश मीडियम होगा? क्या एकबारगी बदलाव से परेशानी नहीं बढ़ेगी?

हम प्रयास करेंगे कि उच्च गुणवत्ता यानी बेहतर पाठ्य सामग्री वाली किताबें तथा विज्ञान व गणित की पठन-पाठन सामग्री दो भाषाओं में हो, ताकि सभी छात्र उन विषयों को अंग्रेजी के साथ-साथ स्थानीय भाषा में भी पढ़ और समझ सकें।

त्रिभाषा को लेकर पहले विवाद रहा। शायद इसीलिए अब उसे नरम कर दिया गया है, लेकिन राष्ट्रभाषा हंिदूी की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता का क्या होगा?

संवैधानिक प्रावधानों, लोगों व क्षेत्रों की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए तीन भाषा वाला फॉर्मूला लागू किया जाएगा। इस फॉर्मूले में अधिक लचीलापन होगा। किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। बच्चों द्वारा सीखी जाने वाली तीन भाषाएं राज्य, क्षेत्र व स्वाभाविक रूप से स्वयं बच्चे ही तय करेंगे, लेकिन उनमें से दो भारतीय होनी चाहिए।

शिक्षा नीति में संस्कृति की बात की गई है। पाठ्यक्रम में किस तरह का बदलाव होगा? क्या हमें वैसी सामग्री ज्यादा मिलेंगी, जिनमें भारत की महानता का वर्णन हो?

हम अभी-अभी नीति लेकर आए हैं। अब यह नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क कमेटी को तय करना है कि कौन-कौन से विषय पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणाली का हिस्सा होंगे। हां, इतना जरूर है कि जनजातीय ज्ञान तथा सीखने के देसी व पारंपरिक तरीकों को बढ़ावा दिया जाएगा।

विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों को देश में कैंपस खोलने की इजाजत से भारतीय संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने की कोशिश प्रभावित तो नहीं होगी?

नीति में कहा गया है भारत को ऐसे वैश्विक स्थान के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कम पैसों में उपलब्ध कराई जा सके। भारतीय संस्थानों को उच्च गुणवत्ता वाले विदेशी संस्थानों के साथ अनुसंधान व शिक्षण सहयोग तथा शिक्षक व छात्र आदान-प्रदान की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। उनके साथ प्रासंगिक समझौते किए जाएंगे।

नीति में फीस को लेकर कैपिंग की बात कही गई है। यह कब तक और किस तरह होगी? इसके दायरे में क्या उच्च शिक्षण संस्थान और स्कूल दोनों आएंगे?

स्कूली व उच्च शिक्षा के व्यावसायीकरण को रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के तंत्र स्थापित किए जाएंगे। विभिन्न संस्थानों की अधिकतम फीस तय करने के लिए पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाएगा, ताकि निजी संस्थानों पर भी प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। किसी भी छात्र के आवेदन के दौरान फीस व अन्य शुल्कों में मनमानी वृद्धि नहीं करनी दी जाएगी। शुल्क निर्धारण तंत्र लागत की उचित वसूली सुनिश्चित करने के साथ यह भी तय करेगा कि उच्च शिक्षण संस्थान अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते रहें।

अरसे से अटकी नई शिक्षा नीति जमीन पर कितनी सरलता से उतरेगी यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का मानना है कि यह पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था के सकारात्मक बदलाव के लिए जरूरी है। शिक्षा मंत्री निशंक से दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता अर¨वद पांडेय की बातचीत के प्रमुख अंश
रमेश पोखरियाल निशंक


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