50 साल आगे को ध्यान में रखकर बनाएं जनसंख्या नीति : भागवत

मुंबई : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आगाह किया है कि देश के विभिन्न समुदायों में जनसंख्या वृद्धि दर में अंतर भविष्य में गंभीर संकट पैदा कर सकता है। आने वाले 50 साल को ध्यान में रखकर नई जनसंख्या नीति बनाने का आह्वान करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि इसे समान रूप से सभी पर लागू भी किया जाना चाहिए। वह शुक्रवार को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परंपरागत दशहरा रैली को संबोधित कर रहे थे। रैली में मुंबई स्थित इजरायली महावाणिज्य दूत कोब्बी शोशानी भी उपस्थित रहे। रैली को संबोधित करने से पहले संघ प्रमुख ने शस्त्र पूजा भी की।


इस वर्ष आरएसएस का 96वां स्थापना दिवस है। इस अवसर पर स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि जनसंख्या वृद्धि की समस्या से सभी चिंतित हैं। तेज गति से बढ़नेवाली जनसंख्या भविष्य में कई समस्याओं को जन्म दे सकती है। इसलिए जनसंख्या नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। उन्होंने 2015 में संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में पेश किए गए एक प्रस्ताव का हवाला देते हुए कहा कि 1951 से 2011 के बीच देश की आबादी में भारतीय मूल के धर्मो के लोगों की जनसंख्या का अनुपात जहां 88 प्रतिशत से घटकर 83.8 प्रतिशत पर आ गया, वहीं मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात 9.8 प्रतिशत से बढ़कर 14.23 प्रतिशत हो गया है।

मोहन भागवत के अनुसार अनवरत विदेशी घुसपैठ एवं मतांतरण के कारण भी देश में, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या का अनुपात बिगड़ा है। यह देश की एकता, अखंडता एवं सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट का कारण बन सकता है। सरसंघचालक ने सुझाव दिया है कि देश में उपलब्ध संसाधनों, भविष्य की आवश्यकताओं एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या को ध्यान में रखते हुए देश की जनसंख्या नीति का पुनर्निर्धारण कर उसे सब पर समान रूप से लागू करना चाहिए। इसके अलावा सीमा पार से हो रही घुसपैठ पर भी पूर्ण रूप से अंकुश लगाया जाना चाहिए।

अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से भारत के लिए पैदा हुए संकट की ओर ध्यान दिलाते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि देश की उत्तर-पश्चिम सीमा अब्दाली के बाद एक बार फिर चिंता का कारण बन रही है। अब तो तालिबान के साथ चीन, पाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान ने गठजोड़ कर एक अपवित्र गठबंधन बना लिया है। तालिबान की ओर से कभी शांति तो कभी कश्मीर की बात की जाती है। दूसरी ओर कुछ लोग तालिबान का हृदय परिवर्तन होने की बाद भी कह रहे हैं। मोहन भागवत के अनुसार उसके हृदय परिवर्तन की बात मान भी ली जाए तो भी हम उसका मूल चरित्र जानते हैं। हमें हर संभावना के लिए तैयार रहना होगा। हमें अपनी सामरिक तैयारियों को सभी सीमाओं पर चुस्त-दुरुस्त रखना होगा।

जम्मू-कश्मीर की चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद वहां परिस्थितियां बदली हैं। वहां के लोगों को मनोबल बढ़ रहा है। उनके मनोबल को गिराने के लिए वहां हंिदूुओं और सिखों की हत्या की जा रही है। लेकिन वहां के लोग भी अब तैयार हैं और कह रहे हैं कि अब हम डरनेवाले नहीं हैं।

हमारी पूजा पद्धति अलग, पूर्वज समान: भागवत ने कहा कि कई समस्याओं का निदान केवल समाज की पहल से ही हो सकता है। हमारी संस्कृति सभी को राष्ट्रीयता के एक सूत्र में बांधकर रखनेवाली है। हमें अपने मत, पंथ, जाति, भाषा, प्रांत की छोटी पहचानों के संकुचित अहंकार को भूलना होगा। बाहर से आए सभी धर्मो को मानने वाले भारतीयों को यह समझना होगा कि हमारी पूजा पद्धति की विशिष्टता के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार से हम एक सनातन राष्ट्र, एक समाज, एवं एक संस्कृति में पले-बढ़े समान पूर्वजों के वंशज हैं।

हंिदूुओं को एकजुट होना होगा

भागवत ने कहा कि हमारे मतभेदों तथा कलहों का उपयोग कर हमें विभाजित करने की मंसा रखनेवाले लोग हमारी गलतियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हंिदूू समाज को समझकर चलना होगा। हमें हर प्रकार के भय से मुक्त होना होगा। दुर्बलता ही कायरता को जन्म देती है। समाज का बल उसकी एकता में होता है। इसलिए समाज में भेद उत्पन्न करनेवाले विचारों, व्यक्तियों, समूहों, घटनाओं से सावधान रहते हुए हमें आपसी कलह से बचकर हमें ‘ना भय देत काहू को, ना भय जानत आप’ ऐसे हिंदू समाज को खड़ा करना होगा।