किस्त जमा नहीं होने पर रद्द हो सकता है बीमा भुगतान का दावा

किस्त की राशि जमा न होने से अमान्य हुई बीमा पालिसी से धनराशि प्राप्त करने के लिए किया जाने वाला दावा अस्वीकार हो सकता है। यह बात सुप्रीम कोर्ट ने कही है। साथ ही इस बात का स्पष्ट उल्लेख बीमा पालिसी के दस्तावेज में करने का निर्देश दिया है। इसी के साथ शीर्ष न्यायालय ने सड़क दुर्घटना के एक मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग के आदेश को रद कर दिया। जस्टिस संजीव खन्ना और बेला एम. त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि बीमा कानूनी आधार पर किया गया समझौता होता है। इसमें दोनों पक्षों को अच्छी भावना से शर्ते पूरी करनी होती हैं। बीमा पालिसी के दस्तावेज में स्पष्ट रूप से शर्ते लिखी होनी चाहिए और उन्हें उसी रूप में समझा जाना चाहिए। एनसीडीआरसी के फैसले के खिलाफ जीवन बीमा निगम सुप्रीम कोर्ट आई थी।


मामले में बीमाधारक ने एलआइसी की जीवन सुरक्षा योजना के तहत 3.75 लाख रुपये का अपना बीमा कराया था। बीमे के एवज में एलआइसी को छमाही किस्त का भुगतान किया जाना था। किन्हीं कारणों से किस्त जमा नहीं हो पाई। छह मार्च, 2012 को बीमाधारक सड़क दुर्घटना में घायल हुआ और 21 मार्च को उसकी मौत हो गई। बीमाधारक की मौत के बाद पत्नी ने बीमा राशि प्राप्त करने के लिए दावा पेश किया और एलआइसी ने उसे 3.75 लाख रुपये की मूल बीमा राशि चुका दी। लेकिन दुर्घटनावश होने वाली अचानक मौत के लिए मिलने वाली अतिरिक्त 3.75 लाख रुपये की धनराशि देने से इन्कार कर दिया।