नियामक प्राधिकारी कार्यालय की भूमिका हर परीक्षा में रही संदिग्ध, शिक्षक भर्ती में भी उठे थे सवाल


लखनऊ। सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा हो या शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी), उत्तर प्रदेश परीक्षा नियामक प्राधिकारी कार्यालय हमेशा संदेह के दायरे में रहा है। सरकार की ओर से जब जब बड़ी जिम्मेदारी दी गई, संस्था ने सरकार की छवि को कटघरे में खड़ा करने के साथ ही लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगाए हैं।


सरकार की ओर से बेसिक शिक्षा परिषद में सहायक अध्यापक भर्ती लिखित परीक्षा कराने के निर्णय के बाद 2017-18 में पहली बार परीक्षा नियामक प्राधिकारी को इसकी जिम्मेदारी दी गई। परिणाम जारी होने के बाद जब अभ्यर्थियों ने आंदोलन किया तो उच्च न्यायालय के आदेश पर जांच कराई गई। पहली बार हुई जांच में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का पता चला। वहीं तत्कालीन परीक्षा नियामक
प्राधिकारी सचिव सुक्ता सिंह और रजिस्ट्रार जिवेंद्र सिंह को निलंबित किया गया। हालांकि सुक्ता सिंह को कुछ समय बाद बहाल कर लखनऊ स्थित निदेशालय में महत्वपूर्ण पद पर तैनाती दी गई। वहीं, 2019-20 में 69000 सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा में भी प्रयागराज में प्रश्न पत्र लीक होने का मामला सामने आया। हालांकि पुलिस के स्तर पर प्रारंभिक जांच में प्रश्न पत्र लीक नहीं माना गया, पर कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया। गलत प्रश्नों को लेकर भी अभ्यर्थियों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। परीक्षा नियामक प्राधिकारी की ओर से आयोजित डीएलएड परीक्षा के प्रश्न पत्र पहले भी कई बार लीक होते रहे हैं।

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