टीईटी के पेपर लीक मामले में उठ रहे सवाल? आखिर सरकारी की बजाय प्राइवेट स्कूल क्यों बनते हैं केंद्र, केंद्र निर्धारण के निर्देश में भी स्पष्टता नहीं

टीईटी के पेपर लीक ने परीक्षाओं के आयोजन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। एक बड़ा मुद्दा प्राइवेट स्कूलों को परीक्षा केंद्र बनाने का भी है। राजकीय और सहायता प्राप्त माध्यमिक स्कूल, अच्छी ख्याति के सीबीएसई-सीआईएससीई बोर्ड के स्कूल, डिग्री कॉलेज और विश्वविद्यालय होने के बावजूद दागी निजी स्कूलों को परीक्षा का जिम्मा दे दिया जाता है। ये स्थिति तब है जबकि पेपर लीक और नकल के ज्यादातर मामलों में प्राइवेट स्कूलों की भूमिका संदिग्ध होती है।


निजी स्कूल से जुड़े चंद रुपयों की लालच में नकल माफिया से साठगांठ कर लेते हैं। जिम्मेदार संस्था के अफसर कहते हैं कि जिलाधिकारी से केंद्रों की सूची मांगी जाती है। ऐसे में उनके हाथ में कुछ नहीं होता। जबकि सच यह है कि सेंटर का सारा खेल डीएम कार्यालय से ही होता है। निजी स्कूल के प्रबंधक जोड़तोड़ करके अपने स्कूल को केंद्र बनवाते हैं। उसी में से कुछ स्कूल के प्रबंधक और स्टाफ अधिक रुपयों की लालच में परीक्षा की गोपनीयता से समझौता कर लेते हैं।

राजकीय और सहायता प्राप्त स्कूलों में सरकारी शिक्षकों की ही ड्यूटी लगती है। जबकि निजी स्कूल कई बार ऐसे लोगों की भी ड्यूटी लगा देते हैं जो किसी स्कूल में शिक्षक नहीं होते। स्कूलों को प्रति परीक्षक प्रति पाली 750 रुपये या अधिक मिलते हैं और वे 200 से 300 रुपये में बाहरी लोगों की ड्यूटी लगा देते हैं।

केंद्र निर्धारण के निर्देश में भी स्पष्टता नहीं

संवेदनशील परीक्षाओं के केंद्र निर्धारण में स्पष्टता नहीं होने से भी निजी स्कूलों को लाभ मिल जाता है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग अपनी परीक्षाओं के लिए जिलाधिकारी से जो केंद्रों की सूची मांगता है, उसमें इस बात का जिक्र नहीं होता है कि किन संस्थाओं को केंद्र निर्धारण में प्राथमिकता दी जाए। यदि इसे स्पष्ट कर दिया जाए कि सबसे पहले राजकीय, उसके बाद सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालय, फिर डिग्री कॉलेज, सीबीएसई-सीआईएससीई बोर्ड के अच्छे स्कूल, विश्वविद्यालय केंद्र बनाए जाएं। कोई केंद्र न मिलने पर ही अच्छी ख्याति के प्राइवेट स्कूलों को ही सेंटर बनाया जाए।

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