मुख्यमंत्री का मंत्र : अपने सहयोगी मंत्रियों को तीन प्रमुख मंत्र दिये

नई सरकार के गठन के बाद अपनी टीम के सदस्यों की पहली और परिचयात्मक बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो सीख दी है, उसका संदेश स्पष्ट है। मुख्यमंत्री ने अपने सहयोगी मंत्रियों को तीन प्रमुख मंत्र दिये हैं। परिवार के हस्तक्षेप से बचना, स्थानांतरण व नियुक्ति में पारदर्शिता और अकारण किसी फाइल को रोककर न रखना। वास्तव में यह भ्रष्टाचार रहित सुशासन का मूलमंत्र है। 




उत्तर प्रदेश की राजनीति अतीत में इसी रोग से पीड़ित रही है। परिवारवाद लाइलाज रोग की तरह जड़ों में जम गया तो ट्रांसफर-पोस्टिंग उद्योग बन गया। फाइल खिसकाने के लिए रिश्वत की परंपरा ऊपर से नीचे तक घर कर गई। इसका परिणाम जनता भुगतती रही। निश्चय ही पांच साल के अनुभव के बाद पढ़ाया गया यह पाठ युवा और पहली बार मंत्री बने सदस्यों ने अवश्य कंठस्थ कर लिया होगा। मुख्यमंत्री ने सहयोगियों को स्पष्ट बता दिया है कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और ईमानदारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। 


मंत्री के सार्वजनिक जीवन से जुड़े दायित्वों और काम में परिवार का किसी भी स्तर पर हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। मंत्रियों को यहां तक नसीहत दी गई कि वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों पर भी नजर रखें। 2017 से पहले अपवाद छोड़कर जिस कदर सत्ता का साथ पाकर सबसे पहले अपने परिवार का पेट भरने की होड़ मच जाती थी, वह किसी से छिपी नहीं है। परिवार के एक सदस्य के मंत्री बनने पर पूरे परिवार का हस्तक्षेप सत्ता प्रतिष्ठान पर बढ़ जाता था। परिवारवादी दलों की तो बात ही अलग। यही वजह है कि विधान सभा चुनाव के दौरान भाजपा ने परिवारवाद को मुख्य निशाने पर रखा। खास तौर पर प्रधानमंत्री ने चुनाव अभियान के सातों चरणों में किसी सभा में परिवारवाद की बुराइयां गिनाने और उस पर हमला बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जनता ने इसे सराहा और मतदाता ने वोट के रूप में अपनी प्रतिक्रिया दी। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो संदेश दिया, उससे स्पष्ट है कि यह मुद्दा चुनावी सभाओं में सिर्फ तालियां बजवाने तक सीमित नहीं था। सरकार की दूसरी पारी में इस पर सख्ती से ध्यान दिया जाएगा कि परिवारवाद का रोग यहां न लगने पाये।