ईवीएम ने बूथ कैप्चरिंग को खत्म किया✍️ कोर्ट कहा-छेड़छाड़ की आशंका और संदेह निराधार, बैलट से मतदान पर चुनाव सुधार की स्थिति पहले जैसी होगी


सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से छेड़छाड़ की आशंका व संदेह को निराधार बताया और कहा कि दोबारा से मतपत्र से मतदान कराने की प्रणाली पर वापस लौटने से पिछले कुछ समय में हुए चुनाव सुधार की स्थिति पहले जैसे हो जाएगी। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ईवीएम की जगह मतपत्र पर वापस लौटना उस दौर में जाना होगा जब बूथकैप्चरिंग होती थी।


शीर्ष अदालत ने ईवीएम में दर्ज 100 फीसदी मतों को वीवीपैट से मिलान करने और फिर से मतपत्र से चुनाव कराने की मांग को लेकर दाखिल याचिकाओं को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) और अन्य की याचिकाओं को खारिज करते हुए सहमति वाले दो अलग-अलग फैसले दिए। जस्टिस खन्ना ने अपने फैसले में कहा है कि याचिकाकर्ताओं ने ईवीएम में हेरफेर या किसी भी तरह से बदलाव किए जाने का अंदेशा जताया है, लेकिन इसे स्वीकार करने के लिए कोई समुचित आधार नहीं होने के कारण इस मांग के दावे को खारिज किया जाता है।

ईवीएम में छेड़छाड़ के पहलू पर जस्टिस खन्ना ने अपने फैसले में लिखा है कि चुनाव परिणाम को बेहतर बनाने/अनुकूल बनाने के लिए जली हुई मेमोरी में अज्ञेयवादी (एगनोस्टिक) फर्मवेयर को हैक करने या उसके साथ छेड़छाड़ करने की संभावना निराधार है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं के इस संदेह को खारिज कर देना चाहिए कि ईवीएम को बार-बार या गलत तरीके से प्रोग्राम करके / छेड़छाड़ करके किसी विशेष उम्मीदवार के पक्ष में वोट की रिकॉर्डिंग किया जा सकता है। ईवीएम और मतदान प्रक्रिया की विश्वसनीयता और अखंडता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त जांच की जाती है।

वोटिंग प्रक्रिया का जिक्र जस्टिस संजीव खन्ना ने फैसले में मतदान से लेकर मतगणना तक के पूरी प्रक्रिया का जिक्र किया और कहा कि हर मतदाता को गुप्त रूप से मतदान करने की अनुमति है। किसी भी मतदाता को मतदान कक्ष में प्रवेश की तब अनुमति नहीं है, जब कोई अन्य मतदाता पहले से वहां मौजूद हो। साथ ही, मतदाता पारदर्शी खिड़की से मुद्रित वीवीपैट पर्ची देखने का हकदार है, जिसमें उस प्रत्याशी का क्रमांक, नाम और चिह्न होता है, जिसे मतदान किया गया।

स्याही लगाने के बाद वोट न दें तो वजह लिखें फॉर्म 17ए में विवरण दर्ज करने और उस पर हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लगाने के बाद भी, यदि कोई निर्वाचक वोट नहीं देता है, तो पीठासीन अधिकारी को फॉर्म 17ए में एक टिप्पणी करनी होगी और उसके खिलाफ निर्वाचक के हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लेना होगा। साथ ही कहा है कि पीठासीन अधिकारी को समय-समय पर फॉर्म 17ए में दर्ज आंकड़ों के साथ नियंत्रण इकाई में दर्ज किए गए वोटों की कुल संख्या की जांच करने की आवश्यकता होती है। मतदान समाप्ति पर पीठासीन अधिकारी द्वारा फॉर्म 17सी में दर्ज वोटों का लेखा-जोखा तैयार करना भी जरूरी है। गिनती मतदान एजेंटों/उम्मीदवारों की उपस्थिति में नियंत्रण इकाई पर परिणाम बटन दबाकर की जाती है।

पांच केंद्रों की रैंडम गिनती संसदीय क्षेत्र के प्रति विधानसभा क्षेत्र में पांच मतदान केंद्रों की वीवीपैट पर्चियों को रैंडम (यादृच्छिक) तरीके से चुना जाता है और पर्चियों का ईवीएम के मतों से मिलाना किया जाता है और फिर परिणामों का मिलान नियंत्रण इकाई के इलेक्ट्रॉनिक परिणामों से किया जाता है। साथ ही कहा है कि आयोग के दिशानिर्देशों के मुताबिक यदि मॉक पोल डेटा या वीवीपैट पर्चियों की मंजूरी न होने के कारण नियंत्रण इकाई और फॉर्म 17सी में दर्ज वोटों की कुल संख्या के बीच कोई अंतर होता है, तो संबंधित की मुद्रित वीवीपैट पर्चियां यदि जीत का अंतर ऐसे मतदान केंद्रों पर पड़े कुल वोटों के बराबर या उससे कम है, तो मतदान केंद्रों की दोबारा से गिनती की जाती है। साथ ही कहा कि ईवीएम का समय-समय पर तकनीकी विशेषज्ञ समिति द्वारा परीक्षण किया गया और इसमें कोई गलती नहीं मिली।

मिलान में खामी नहीं मिली जस्टिस खन्ना ने कहा कि यह भी देखा गया है कि अब तक चार करोड़ से अधिक वीवीपैट पर्चियों का मिलान उनकी नियंत्रण इकाइयों की इलेक्ट्रॉनिक गणनाओं से किया जा चुका है। लेकिन एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया (उस मामले को छोड़कर जहां मॉक पोल डेटा को न हटाने के कारण विसंगति हुई थी) जिसमें परिणाम में अंतर आया हो।




 

ईवीएम ने बूथ कैप्चरिंग को खत्म किया कोर्ट 
बार-बार संदेह चुनाव में जनता के भरोसे को कम करता है
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि चुनाव प्रणाली पर बार-बार संदेह और निराधार चुनौतियां, यहां तक कि सबूतों के अभाव में भी, चुनाव में मतदाताओं के विश्वास और भागीदारी को कमजोर कर सकती हैं। पीठ ने कहा है कि बार-बार और लगातार संदेह और निराशा, यहां तक कि बिना सबूत के भी, अविश्वास पैदा करने का विपरीत प्रभाव डाल सकती है। इससे चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी और आत्मविश्वास कम हो सकता है, जो एक स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। बिना किसी ठोस आधार के ईवीएम को दी जा रही चुनौतियां वास्तव में धारणाओं और पूर्वाग्रहों को प्रकट कर सकती हैं।

आशंका के आधार पर सवाल उठाने की अनुमति नहीं

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अलग लिखे अपने फैसले में कहा कि शीर्ष अदालत ईवीएम की प्रभावशीलता के बारे में याचिकाकर्ताओं को आशंकाओं और अटकलों के आधार पर आम चुनावों की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाने और उसे प्रभावित करने की अनुमति नहीं दे सकते। उन्होंने कहा, ईवीएम अपने काम पर खरी उतरी हैं और मतदाताओं ने इस पर विश्वास व्यक्त किया है।

देश को पिछले 70 सालों से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने पर गर्व रहा है, जिसका श्रेय काफी हद तक भारत के निर्वाचन आयोग और जनता द्वारा उस पर जताए गए विश्वास को दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ना तो कभी यह दिखा पाए कि चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के सिद्धांत का कैसे उल्लंघन करता है और न ही ईवीएम में दर्ज सभी मतों को वीवीपैट पर्चियों के शत प्रतिशत मिलान के अधिकार को साबित कर सके।

आशंका के आधार पर सवाल उठाने की अनुमति नहीं

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अलग लिखे अपने फैसले में कहा कि शीर्ष अदालत ईवीएम की प्रभावशीलता के बारे में याचिकाकर्ताओं को आशंकाओं और अटकलों के आधार पर आम चुनावों की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाने और उसे प्रभावित करने की अनुमति नहीं दे सकते। उन्होंने कहा, ईवीएम अपने काम पर खरी उतरी हैं और मतदाताओं ने इस पर विश्वास व्यक्त किया है।

देश को पिछले 70 सालों से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने पर गर्व रहा है, जिसका श्रेय काफी हद तक भारत के निर्वाचन आयोग और जनता द्वारा उस पर जताए गए विश्वास को दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ना तो कभी यह दिखा पाए कि चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के सिद्धांत का कैसे उल्लंघन करता है और न ही ईवीएम में दर्ज सभी मतों को वीवीपैट पर्चियों के शत प्रतिशत मिलान के अधिकार को साबित कर सके।

वीवीपैट पर्ची गिनने को मशीन की संभावना तलाशें

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही ईवीएम में दर्ज 100 फीसदी मतों को वीवीपैट पर्चियों से मिलान करने की मांग को ठुकरा दिया है, लेकिन फैसले में भविष्य में इसमें क्या सुधार हो सकता है, इसकी संभावना तलाशने को कहा है। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को इस बात की संभावना तलाशने को कहा है कि क्या वीवीपैट पर्चियों को गिनने के लिए मशीन का इस्तेमाल किया जा सकता है? दरअसल, आयोग ने कहा था कि 100 फीसदी वीवीपैट पर्ची की गिनती से मतगणना में काफी वक्त लगेगा। इस पर याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि यदि मतगणना कर्मियों की संख्या बढ़ा दी जाए तो इसमें वक्त कम लगेगा। इसके साथ ही, पीठ को यह सुझाव दिया गया था कि वीवीपैट में लोड किए गए चुनाव चिह्नों में बारकोड लगा दिया जाए तो आसानी से गिनती हो सकती है। आयोग से कोर्ट ने इस पर भी संभावना तलाशने को कहा है।

वीवीपैट पर्ची गिनने को मशीन की संभावना तलाशें

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही ईवीएम में दर्ज 100 फीसदी मतों को वीवीपैट पर्चियों से मिलान करने की मांग को ठुकरा दिया है, लेकिन फैसले में भविष्य में इसमें क्या सुधार हो सकता है, इसकी संभावना तलाशने को कहा है। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को इस बात की संभावना तलाशने को कहा है कि क्या वीवीपैट पर्चियों को गिनने के लिए मशीन का इस्तेमाल किया जा सकता है? दरअसल, आयोग ने कहा था कि 100 फीसदी वीवीपैट पर्ची की गिनती से मतगणना में काफी वक्त लगेगा। इस पर याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि यदि मतगणना कर्मियों की संख्या बढ़ा दी जाए तो इसमें वक्त कम लगेगा। इसके साथ ही, पीठ को यह सुझाव दिया गया था कि वीवीपैट में लोड किए गए चुनाव चिह्नों में बारकोड लगा दिया जाए तो आसानी से गिनती हो सकती है। आयोग से कोर्ट ने इस पर भी संभावना तलाशने को कहा है।

जब तक ईवीएम के खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए जाते, तब तक मौजूदा प्रणाली जारी रहेगी। व्यवस्था के किसी भी पहलू पर आंख मूंदकर अविश्वास संदेह पैदा कर सकता है।

-जस्टिस दीपांकर दत्ता, सुप्रीम कोर्ट

फैसले ने कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को बेनकाब कर दिया है। इन दलों ने चुनाव आयोग को बदनाम करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने शानदार फैसला दिया है।

-अर्जुन राम मेघवाल, कानून मंत्री