‘पेंशन-ग्रेच्युटी लंबी सेवा बाद मिला अधिकार, कोई उपहार नहीं’
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने राज्य सरकार के रुख पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि एक मामले में लाभ देना और समान परिस्थितियों वाले दूसरे मामले में विरोध करना भेदभावपूर्ण है। एक कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार को अपने कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनर्विचार याचिका का दायरा सीमित होता है और स्पष्ट त्रुटि के बिना उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि मूल आदेश में कोई गलती नहीं थी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पेंशन व ग्रेच्युटी लंबी सेवा के बाद कर्मचारियों को मिला अधिकार है, यह कोई उपहार नहीं है। यह वृद्धावस्था का सहारा है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा अवधि में मृत्यु हो जाती है तो उसके परिवार को अधिकार मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट ने अपने फैसलों में कई बार कहा है कि विभागीय गलती से हुए अधिक भुगतान की वसूली कर्मचारियों से नहीं की जा सकती।
न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकलपीठ ने सेवानिवृत्त कांस्टेबल देवेंद्र सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए उसके पेंशन से अधिक भुगतान की कटौती संबंधी पुलिस कमिश्नर व डीसीपी आगरा को स्पष्टीकरण मांगा। कोर्ट ने पूछा है कि क्यों उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जाए। अगली सुनवाई 12 मई को निर्धारित है, जिसमें अधिकारियों के हाजिर रहने का निर्देश दिया गया है।
कोर्ट ने प्रमुख सचिव (गृह) से भी इस बात का व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों के हित संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं? याचिका में कहा गया है कि याची दो अक्टूबर 1984 को कांस्टेबल नियुक्त हुआ और 3 मई 2025 को सेवानिवृत्त पुलिस में साढ़े पांच लाख से अधिक की कटौती कर ली गई। इस निर्णय को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने याची के पक्ष में अंतरिम निर्णय देते हुए आदेश दिया कि कटौती निरस्त कर दी जाए। याची का कहना है कि विभाग की गलती से अधिक भुगतान की सेवानिवृत्ति के बाद वसूली नहीं की जा सकती। यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है।

