मात्राओ व बत्तख की सफलता के बाद अब चना की सफलता देखिये शिक्षकों की ट्रेनिंग में: नाच के पढ़ाता शिक्षक कार्टून लगता है, ये नवाचार नहीं है।

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नाच के पढ़ाता शिक्षक कार्टून लगता है। हर काम के लिए एक अलग आदमी और एक अलग उम्र होती है। अच्छा एक काम करिए। अपने 60 साल के बूढ़े पिता को खचाखच भरी कक्षा में 50 बच्चों के सामने शिनचैन - डोरेमोन की तरह कूल्हा मटकाते और अतरंगी अटखेलियां करते चित्रित करिए। मैं फिर कहता हूं। अपने पिता को ये हरकतें करते इमेजिन करिए। अटपटा लग रहा है न??

ये नवाचार नहीं है। शिक्षक को क्लास में डांस करवाना नवाचार नहीं है। सोचिए पुलिस वाले मूँ धाँय धाँय करते कैसे लगेंगे? बैंक वाले अगर कस्टमर के लिए नोट गिनते समय मूँ से किर्र किर्र की आवाज निकालते होते तो कैसे लगते? काम करने के तरीके होते हैं।

ये सही है कि बच्चे कार्टून देख कर सीखते हैं। पर अगर बच्चे कार्टून से सीखते हैं तो उन्हें कार्टून दिखाए जाने चाहिए, शिक्षक को कार्टून नहीं बना दिया जाना चाहिए। बच्चे कार्टून की इज्जत नहीं करते। कार्टून उन्हें अनुशासन नहीं सिखा सकता। हाँ, मनोरंजन जरूर करवा सकता है। पर उसके लिए फिर शिक्षक भर्ती परीक्षाओं की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी। बंबई जा कर जूनियर आर्टिस्ट भर्ती किए जा सकते हैं। (आऊटसोर्सिंग से)

यदि गुणवान और अनुशासित बच्चे चाहिए, तो कार्टून शिक्षक बनाना बंद कर दीजिए। मर्यादित कपड़े पहने, गरिमा के आवरण से बंधे आधी उम्र गुजर चुके उर्जापुंज शिक्षक,  नौनिहालों के सामने कमर मटकाते और शर्म से अपना चेहरा लाल करते अच्छे नहीं लगते।


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