इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूल में प्रधानाध्यापक पद पर चयन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में याचिका खारिज करते हुए कहा है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर चयन प्रक्रिया पूरी न होने पर अभ्यर्थी कोई वैध या अर्जित अधिकार दावा नहीं कर सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चयन समिति की संस्तुति मात्र से नियुक्ति का अटल अधिकार उत्पन्न नहीं होता। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने भूपाल सिंह की याचिका पर दिया है।
मामले में याची भूपाल सिंह ने वर्ष 2016 में बिजनौर स्थित एक सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूल में प्रधानाध्यापक पद के लिए आवेदन किया था। विद्यालय में रिक्ति उत्पन्न होने पर 15 जुलाई 2016 को विज्ञापन जारी किया गया और चयन समिति ने 29 जुलाई 2016 को याची के चयन की संस्तुति कर दी। इसके बाद 30 जुलाई 2016 को अनुमोदन के लिए अभिलेख बेसिक शिक्षा अधिकारी, बिजनौर को भेजे गए।
हालांकि, बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 17 अगस्त 2016 को अनुमोदन देने से इनकार कर दिया। कारण यह बताया गया कि शासनादेश 3 जून 2016 के अनुसार चयन प्रक्रिया 31 जुलाई 2016 तक पूरी कर ली जानी आवश्यक थी, जबकि चयन संबंधी अभिलेख 2 अगस्त 2016 को कार्यालय में प्राप्त हुए। याची ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कई चरणों में मुकदमेबाजी की। बाद में विशेष अपील में मामला पुनर्विचार के लिए भेजा गया, लेकिन पुनर्विचार के बाद भी 28 अक्टूबर 2024 को बेसिक शिक्षा अधिकारी ने दावा अस्वीकार कर दिया। इसी आदेश को वर्तमान याचिका में चुनौती दी गई थी।
याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि चयन प्रक्रिया बाद के संशोधनों और शासनादेशों से पहले शुरू हो चुकी थी, इसलिए उस पर वही नियम लागू होने चाहिए जो विज्ञापन जारी होने के समय प्रभावी थे। यह भी कहा गया कि 3 जून 2016 का शासनादेश केवल निर्देशात्मक था, अनिवार्य नहीं। साथ ही यह दलील दी गई कि चयन समिति द्वारा चयनित किए जाने के बाद याची के पक्ष में एक अर्जित अधिकार उत्पन्न हो गया था।
वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि शासनादेश में निर्धारित समय सीमा बाध्यकारी थी और चयन प्रक्रिया समय सीमा के भीतर पूरी नहीं हुई। सरकार ने यह भी कहा कि बाद में भर्ती व्यवस्था में व्यापक बदलाव हुए और केंद्रीकृत चयन प्रणाली लागू कर दी गई, जिसके बाद अधूरी चयन प्रक्रियाएं स्वतः समाप्त मानी जाएंगी।
न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि 3 जून 2016 का शासनादेश केवल औपचारिक निर्देश नहीं बल्कि प्रशासनिक उद्देश्य से जारी बाध्यकारी नीति थी, जिसका उद्देश्य लंबित भर्तियों को समयबद्ध तरीके से पूरा करना और राज्यभर में एकरूपता बनाए रखना था। कोर्ट ने माना कि जब किसी प्रशासनिक आदेश में समय सीमा सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए निर्धारित की जाती है, तो उसे सामान्यतः अनिवार्य माना जाएगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि चयन समिति की संस्तुति से नियुक्ति का अविच्छेद्य अधिकार उत्पन्न नहीं होता। इस संबंध में न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि चयन सूची में नाम आने या संस्तुति होने से केवल अपेक्षा उत्पन्न होती है, कानूनी अधिकार नहीं। न्यायालय ने रूल्स ऑफ द गेम बदलने संबंधी तर्क को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि यहां चयन प्रक्रिया के बीच नियम नहीं बदले गए, बल्कि मूल शर्त यानी 31 जुलाई 2016 तक प्रक्रिया पूरी करने की अनिवार्य शर्त का पालन ही नहीं हुआ। इसलिए चयन प्रक्रिया स्वयं ही निर्धारित तिथि के बाद निष्प्रभावी हो गई।

