भरोसे की नींव और प्रशासनिक नैतिकताकिसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली शर्त न्याय है और न्याय का आधार स्थिरता। जब एक शिक्षक तत्कालीन नियमों और मान्यताओं के अनुसार नियुक्त होता है, दशकों तक अपनी सेवाएँ देता है और विभाग उससे निरंतर काम लेता है, तो अचानक वर्षों बाद नए नियमों को 'बैक-डेट' से लागू करना केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं है। यह उस विश्वास पर प्रहार है जो एक कर्मचारी अपनी व्यवस्था के प्रति रखता है। खेल शुरू होने के बाद नियम बदलना खेल की भावना के विपरीत है।
सुधार बनाम दंड: नीतिगत विरोधाभास
आरटीई अधिनियम 2009 और टीईटी की अनिवार्यता का उद्देश्य निस्संदेह शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था। योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक समाज की आधारशिला हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सुधार का अर्थ उन लोगों को दंडित करना है जो उस समय की वैधानिक प्रक्रिया का पालन कर नियुक्त हुए थे? यदि उस दौर में चयन बोर्ड और नीति निर्माताओं ने टीईटी को अनिवार्य नहीं माना, तो आज उस विसंगति का दंड केवल शिक्षक क्यों भुगते? यह व्यक्ति की नहीं, बल्कि तंत्र की चूक थी।
अनुभव बनाम अंक: योग्यता का असली मापदंड क्या?
आज जो शिक्षक संकट में हैं, उनमें से कई दो दशकों से अधिक समय से कक्षाओं में पसीना बहा रहे हैं। उनके पढ़ाए छात्र आज समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुके हैं।
क्या वर्षों के व्यावहारिक शिक्षण कौशल का कोई मोल नहीं?
क्या कक्षा प्रबंधन और स्थानीय सामाजिक समझ एक परीक्षा के अंकों से कमतर है?
क्या अनुभव को शून्य मानकर केवल एक प्रवेश परीक्षा को योग्यता का अंतिम प्रमाण मान लेना न्यायसंगत है?
संवेदनहीनता और वैकल्पिक मार्ग
पुराने शिक्षकों के लिए टीईटी को 'नौकरी बचाने' की शर्त बनाना संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है। यदि वास्तव में गुणवत्ता सुधार ही लक्ष्य है, तो सरकार को अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए था:
ब्रिज कोर्स की व्यवस्था।
दक्षता उन्नयन कार्यक्रम।
चरणबद्ध मानकीकरण।
अकादमिक मूल्यांकन।
सीधे अस्तित्व पर संकट खड़ा कर देना न तो शिक्षक के हित में है और न ही उन बच्चों के, जो इन अनुभवी कंधों के सहारे शिक्षा पा रहे हैं।
न्याय की व्यापक परिभाषा
न्याय केवल शब्दों की कानूनी व्याख्या नहीं है, बल्कि उसके सामाजिक परिणाम भी हैं। प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का सिद्धांत कहता है कि किसी भी व्यक्ति को उन नियमों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता जो उसकी नियुक्ति के समय अस्तित्व में ही नहीं थे। लाखों परिवारों का भविष्य और ग्रामीण शिक्षा की रीढ़ आज अनिश्चितता के भंवर में है।
निष्कर्ष: विश्वास की बहाली आवश्यक
पुराने नॉन-टीईटी शिक्षकों का पक्ष लेना गुणवत्ता का विरोध करना नहीं है। यह उस सिद्धांत की रक्षा करना है कि राज्य को अपने पुराने निर्णयों और वादों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। नियम भविष्य के लिए कठोर हो सकते हैं, लेकिन उन्हें अतीत को दंडित करने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।
आज जब मामला पुनरीक्षण की दहलीज पर है, तो अपेक्षा केवल 'राहत' की नहीं बल्कि 'न्याय' की है। क्योंकि जब राज्य अपने ही पुराने फैसलों से मुकरता है, तो सबसे बड़ा संकट नौकरी का नहीं, बल्कि भरोसे का होता है।
एक सजग शिक्षक द्वारा प्रस्तुत ✍️

