69000 की जनरल की मेरिट क्यों नीचे गयी और क्यों ज्यादा अंतर नहीं रहा जनरल और ओबीसी में इसके संबंध में बेहद उपयोगी पोस्ट:- ✍️संकल्प गुप्ता की कलम से


69000 की जनरल की मेरिट क्यो नीचे गयी और क्यों ज्यादा अंतर नहीं रहा जनरल और ओबीसी में इसके संबंध में बेहद उपयोगी पोस्ट

*साभार संकल्प गुप्ता*

क्या है MRC जिसके कारण ओबीसी/एससी ने 69000 भर्ती में ओबीसी/एससी वर्ग को किया परेशान


मेरिटोरियस रिज़र्व कैंडिडेट्स (MRC)
बेसिक शिक्षक का कैडर जिला स्तरीय कैडर है, अर्थात हर जिले की अलग-अलग भर्ती होती है। शिक्षकों की व्यापक कमी के बाद कल्याण सिंह ने वर्ष 1999 में SBTC 1999 के नाम से बीएड बेरोजगारों की भर्ती की। उसकी चयन मेरिट प्रदेश स्तर पर बनी। प्रदेश स्तर पर रिक्तियों पर आरक्षण लागू हुआ। इसके बाद चयनितों को उनके आसपास का जिला देकर 6 महीने का SBTC प्रशिक्षण देकर सहायक अध्यापक पद पर नियुक्त कर दिया गया।
जिसमें ओबीसी वर्ग ने अनारक्षित वर्ग की रिक्तियों पर जमकर कब्जा किया। क्योंकि ओबीसी की कुछ जातियां सिर्फ नाममात्र की आरक्षित हैं शेष वह जनरल वर्ग को चुनौती देती हैं। यह भर्ती लगभग 18000 पदों पर हुई थी।
राजनाथ सिंह ने भी अपने कार्यकाल में SBTC का विज्ञापन जारी किया। जिसपर आरक्षण विसंगति को लेकर कोर्ट ने स्थगन कर दिया।
मुलायम सिंह यादव 2004 में मुख्यमंत्री बने तो राजनाथ सिंह का विज्ञापन रद्द कर दिया। बेसिक शिक्षा सचिव नीरा यादव ने बेसिक शिक्षा नियमावली 1981 में दसवां संशोधन करके रूल 8 (1) में उपवर्ग (ii) जोड़ दिया। जिसमें वर्णित है कि BTC के साथ SBTC भी सहायक अध्यापक पद पर नियुक्त किये जायेंगे।
मुलायम सिंह ने SBTC 2004 के नाम से 40000 पदों पर विज्ञापन निकाला और प्रदेश स्तरीय मेरिट बनाई जिसमें ओबीसी वर्ग ने जनरल वर्ग में खूब फाइट किया। जिससे अधिकतर सवर्ण भर्ती से बाहर हो गए। सब चयनितों को आसपास का जिला मिल गया। चयन प्रक्रिया 31 मार्च 2005 के पूर्व हुई और प्रशिक्षण के बाद सबकी सहायक अध्यापक पद पर नियुक्ति दिसंबर 2005 से जनवरी 2006 के आसपास हुई। इसी वजह से 31 मार्च 2005 को बंद हुई पुरानी पेंशन ने SBTC 2004 को सुरक्षा नहीं प्रदान की। क्योंकि सब उसके बाद सहायक अध्यापक बने। SBTC 2004 कोर्ट में गुहार लगाते हैं कि उनका प्रथम चयन 1 अप्रैल 2005 के पूर्व हो गया था लेकिन कोर्ट प्रथम चयन को मात्र BTC के समान चयन मानती है क्योंकि नियमावली का संशोधन 10 अर्थात रूल 8 का दूसरा उपवर्ग इसकी पुष्टि करता है।
*State Government issued Government Order dated 14.1.2004 providing for Special B.T.C. 2004 and issued an advertisement inviting applications for selections. The U.P. Basic Education (Teachers) Services (Xth Amendment) Rules, 2004 issued by Notification dated 14.1.2004 amended Rule 8 (1) (ii), including the 'Special Basic Teachers Certificate (B.T.C.)', alongwith other prescribed training qualifications for appointment as Assistant Teachers in Basic Schools.*
मुलायम सिंह ने 88000 भर्ती और निकालना चाहा लेकिन उनकी सरकार चली गयी और मायावती ने SBTC 2007-08 के नाम से भर्ती को तीन भाग में बांटकर किया।
SBTC 60000, SBTC 10000 (विशेष चयन जिसमें सिर्फ आरक्षित वर्ग को आवेदन का मौका मिला) और SBTC 18000, इस तरह मायावती की सरकार में सवर्णों का दबदबा था और अच्छे-अच्छे विधि विद्वान भी थे। उन्होंने कुछ ऐसा खोजना चाहा जिससे ओबीसी के लोग ओबीसी का ही गला काट दें और नियम को विधि विरुद्ध भी न माना जाए।
मायावती सरकार ने जिला स्तरीय आवेदन लेने का निर्णय लिया। इसका हवाला दिया कि बेसिक शिक्षक का कैडर जिला स्तरीय कैडर है। इसकी चयन प्रक्रिया भी जिला स्तरीय होनी चाहिए। यह एक ऐसा निर्णय था जिसने सवर्णों को संजीवनी दे दी। आवेदकों ने सौ-सौ रूपया का बैंक ड्राफ्ट बनवाकर अधिक से अधिक जिलों में आवेदन किया।
जिसका परिणाम रहा कि ओबीसी का वह अभ्यर्थी जिसका चयन अपने गृह जनपद में ओबीसी में हो गया तो उसने ओबीसी में चयन ले लिया। जबकि दूर जनपद में उसका जनरल में हो जाता और वह जनरल में जाता तो गृह जनपद में कम मेरिट वाला ओबीसी चयन पा जाता। मगर कोई दूर नहीं जाना चाहा और जनरल की मेरिट कम होती गयी और जनरल दूर जनपद जाकर चयन पा लिया। इस तरह वही ओबीसी जनरल में गए जिनका चयन अपने जनपद में ही जनरल में हो गया।
जिसका परिणाम रहा कि बहुत कम ओबीसी ने जनरल में स्थान लिया और सवर्णो को काफी राहत मिली।
मायावती सरकार ने ऐसी काट खोजी की ओवरलैपिंग का प्रभाव कम हो गया और यह नियम विरुद्ध भी नहीं था क्योंकि ओबीसी खुद ही ओबीसी को बाहर कर रहा था। जिलास्तरीय भर्ती होने के कारण उसे कम मेरिट वाला ओबीसी दूर जाने के लिए मजबूर भी नहीं कर सकता था। आरक्षित को खुश करने के लिए 10000 विशेष चयन आरक्षितों का ही कर दिया।
2012 में अखिलेश यादव ने अंतर्जनपदीय स्थानांतरण करके दूर नौकरी पाये लोगों को गृहजनपद या आसपास के जनपद में जाने का अवसर दे दिया।
RTE एक्ट के बाद 72825 भर्ती आयी तो वह भी जिलास्तरीय भर्ती थी। जिसका विज्ञापन BSA द्वारा न जारी होने के कारण कोर्ट ने स्थगन कर दिया था मगर अंत में कई मुकदमों का सामना करते हुए रो गाकर भर्ती हो गयी। इस भर्ती में भी आरक्षितों ने दूर जनपद जाकर जनरल में फाइट करना उचित नहीं समझा और आसपास ही आरक्षित शीटों पर कब्जा किये।
जिससे ओवरलैपिंग हुई परंतु कम हुई।
योगी सरकार ने 68500 भर्ती लाया तो परीक्षा में 41556 ही उत्तीर्ण हुए तो सरकार ने 41556 के सापेक्ष ही जिला आवंटन किया। एक साथ ही सभी जिले में एक ही आवेदन से ऑनलाइन आवेदन का यह पहला मौका था। आवंटन के सॉफ्टवेयर ने प्रदेश की सभी रिक्तियों को जोड़कर राज्य स्तरीय आरक्षण दे दिया तो अधिक मेरिट वाले ओबीसी दूर जनपद में जनरल में जाकर चयनित हो गए और कम मेरिट वाले ओबीसी अपने गृह जनपद में हो गए। जनरल की शीट खत्म हो गयी और लगभग 6000 सवर्ण को जिला ही नहीं मिला।
वे ओबीसी अथवा आरक्षित परेशान हो गए जिनका मित्र या पड़ोसी उनसे कम नंबर पाकर गृह जनपद में ही नौकरी पा गया और वो अधिक नंबर पाकर दूर चले गए। माँ बाप ने भी कोसा कि तुम कहते थे कि तुम अधिक नंबर पाये हो फिर तुम दूर चले गए और वह तुमसे कम नंबर पाने वाला घर मे ही नौकरी पा गया।
जबकि कमाल तो जिलास्तरीय भर्ती में राज्यस्तरीय आरक्षण का था कि अधिक योग्य दूर चला गया क्योंकि वह जनरल शीट में नौकरी पाया और कम मेरिट वाला अपने जिले में नौकरी पाया क्योंकि वह आरक्षित शीट में हुआ। जनरल में नौकरी पाने वाले ओबीसी का किसी ने भी मनोबल नहीं बढ़ाया बल्कि उसपर कम योग्य होने का तमगा लगाया गया।
सरकार ने धरना देने वाले सवर्णों को नौकरी दे दी। इससे सबको नौकरी मिल गई। कुछ लोग बाद में परीक्षा उत्तीर्ण हुए जिनका मामला चल रहा है।
अच्छी मेरिट वाले ओबीसी ने कम मेरिट वाले ओबीसी को अदालत में चुनौती दे दी। उसने तर्क दिया कि कम मेरिट वाले ने उसका स्थान ले लिया। याची का चयन दूर जनपद में हो गया और उससे कम मेरिट वाले का गृहजनपद में हो गया।
वे जनरल जो प्रथम जनपद आवंटन में दूर चले गए और कम मेरिट वाले जनरल जिनका चयन नहीं हुआ वे बाद में गृह जनपद में या पास के जनपद में नौकरी पा गए तो अधिक मेरिट लाकर दूर चले जाने वाले जनरल को भी पीड़ा हुई।
इस तरह टॉप मेरिट वाले जनरल ने भी कम मेरिट वाले जनरल को चुनौती दी।
अशोक खरे ने टॉप मेरिट वाले जनरल का मुकदमा कम मेरिट वाले जनरल के विरुद्ध लड़ा और अधिक मेरिट वाले ओबीसी अथवा आरक्षित का मुकदमा कम मेरिट वाले ओबीसी अर्थात आरक्षित के विरुद्ध लड़ा। इन दोनों को दिक्कत थी कि कम अंक वाला पास नौकरी करेगा और अधिक अंक वाला दूर नौकरी करेगा तो अन्याय होगा। ऊपर से सरकार ने अंतर्जनपदीय स्थानांतरण न करने का शपथ पत्र भी लिया है। कहीं सच में न करे तो दिक्कत हो जाएगी।
जस्टिस प्रकाश पाडिया ने जनरल की याचिका यह कहकर खारिज कर दी कि जब कम मेरिट वालों का चयन नहीं हुआ तब उन्हें दुबारा शीट दी गयी। प्रथम जनपद आवंटन वाले लोग द्वितीय जनपद आवंटन को चुनौती नहीं दे सकते हैं।
मगर ओबीसी वर्ग की याचिका स्वीकार कर ली। क्योंकि ओबीसी के टॉप मेरिट वाले प्रथम आवंटन में ही दूर भेज दिए गए थे। जबकि कम मेरिट वाले ओबीसी पास ही चयन पा गए थे। कोर्ट ने कहा कि जिलास्तरीय भर्ती है। जिला स्तरीय आरक्षण लागू करके टॉप मेरिट वालों का उनकी वरीयता जनपद के अनुसार चयन हो।
कोर्ट ने टॉप मेरिट वालों को MRC का नाम दिया। मेरिटोरियस रिज़र्व कैंडिडेट्स जिसका फुल फॉर्म हुआ।
जनरल वाले अपील में गए तो खंडपीठ ने एकलपीठ में रिव्यु करने का सुझाव दिया। रिव्यु में सुनवाई हुई और आर्डर रिज़र्व हो गया।
योगी सरकार ने 69000 भर्ती निकाली, परीक्षा हुई मुकदमा आदि चला और भर्ती के लिए आवेदन हुआ तो राघवेंद्र पाण्डेय के प्रयास से 68500 का रिव्यु का आदेश आ गया जिसमें जनरल का रिव्यु खारिज हुआ और मेरिटोरियस ओबीसी के लोग डाउन मेरिट ओबीसी के विरुद्ध पुनः जीत गए।
सरकार ने 69000 में आरक्षण जिला स्तरीय लागू कर दिया। क्योंकि 68500 जैसा विवाद सरकार 69000 में नहीं चाहती थी। जिसका परिणाम रहा कि ओबीसी के टॉप मेरिट वाले गृह जनपद पा गए, ओबीसी के कम मेरिट वाले बाहर हो गए और ओबीसी के टॉप मेरिट वालों द्वारा जो दूर के जनपद छोड़ दिये गए अर्थात वहां जनरल में नहीं गए वहां कम मेरिट वाले जनरल का हो गया। जिसका परिणाम रहा कि ओबीसी और जनरल की मेरिट में एक गुणांक से भी कम का अंतर है।
यह चयन पूर्ण संवैधानिक भी है और ऐसा चयन मायावती सरकार SBTC 2007-08 में और अखिलेश सरकार 72825 में कर चुके हैं। बस प्रक्रिया अब पूर्ण ऑनलाइन है तो सबकुछ सामने है। इस तरह मायावती द्वारा अपनायी गयी जिला स्तरीय चयन नीति ने ओवरलैपिंग के प्रभाव को कम कर दिया था। जब तक बेसिक शिक्षक का कैडर राज्यस्तरीय नहीं होगा तब तक ऐसा ही चयन होता रहेगा और यही न्यायसंगत भी है। एससी वर्ग और एसटी वर्ग कम ओवरलैपिंग करते हैं चाहे प्रदेश स्तरीय चयन हो या जनपद स्तरीय चयन हो। योगी सरकार में त्रुटिवश 68500 में कल्याण सिंह और मुलायम सिंह का प्रदेश स्तरीय आरक्षण लग गया था लेकिन ओबीसी ने ही ओबीसी के विरुद्ध लड़कर ओबीसी का अंत कर दिया और मायावती द्वारा इजात किया गया जिलास्तरीय आरक्षण 69000 भर्ती में लग गया और जिसका लाभ सवर्ण को संवैधानिक तरीके से मिला। इसमें आरक्षित जनरल पर न तो कोई दोष लगा सकता है और न मुकदमा लड़ सकता है। टॉप मेरिट वाला आरक्षित अपना जिला पाकर खुश है तो कम मेरिट वाला सवर्ण नौकरी पाकर खुश है।

धन्यवाद।।