हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपने एक निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया विधिसम्मत रही हो और कर्मचारी लगातार सेवा में रहा हो, तो तदर्थ सेवा को भी पदोन्नति के लिए गिना जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा है कि यदि किसी कर्मचारी से कनिष्ठ कर्मचारी को पदोन्नति मिल चुकी है, तो उसे भी उसी तिथि से पदोन्नति का अधिकार है, भले ही उसकी सेवा का
नियमितीकरण बाद में हुआ हो। यह फैसला खंडपीठ ने राज्यसरकार
की दो विशेष अपीलों को खारिज करते हुए सुनाया है। मूल याची अनिल कुमार और शैलेंद्र सिंह आवास एवं शहरी नियोजन विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। दोनों वर्ष 1986 में जूनियर इंजीनियर के पद पर तदर्थ (एडहॉक) नियुक्त हुए थे और बाद में उनकी सेवाएं नियमित की गईं। विवाद तब हुआ जब इनके बाद नियुक्ति पाए कर्मचारियों को सहायक अभियंता पद पर पदोन्नति दे दी गई, जबकि याचियों को वंचित रखा गया। सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि चूंकि याचियों की सेवाएं उस समय तक नियमित नहीं हुई थीं, इसलिए उन्हें पिछली तिथि से पदोन्नति नहीं दी जा सकती।

