04 March 2026

परिसर खाली किया तो किरायेदार का अधिकार खत्म : हाईकोर्ट

  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि किसी किरायेदार का अधिकार तभी तक रहता है, जब तक वह किराया देता है, कब्जे में रहता है और बेदखली के आदेश का सामना करता है। यदि किरायेदार परिसर को खाली कर देता है तो उसका अधिकार समाप्त हो जाता है। उसे बेदखली नोटिस देना जरूरी नहीं है।

यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने वाराणसी के फरमान इलाही की याचिका खारिज करते हुए दिया है। याचिका में दाल मंडी में सरकारी ध्वस्तीकरण को चुनौती दी गई थी। याची कुंडिगढ़ टोला दाल मंडी स्थित मकान नंबर सीके 39/5 में किरायेदार था। उसने मकान मालिक शहनवाज खान द्वारा 27 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार के पक्ष में निष्पादित बिक्री पत्र को चुनौती दी थी। उसका कहना था कि वह निगरानी याचिका में इस कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम सुरक्षा के तहत आता है, जो जज खफ़ीफ़ा की अदालत के बेदखली आदेश के खिलाफ की गई थी। याची के अनुसार वह लैंड एक्विजिशन रिहैबिलिटेशन एंड रीसेटलमेंट एक्ट 2013 की धारा 2(10) के तहत इंटरेस्टेड पर्सन की परिभाषा में आता है। राज्य सरकार को भूमि अधिग्रहण करने से पहले उसे धारा 21 के तहत नोटिस देना था। राज्य सरकार की अधिवक्ता श्रुति मालवीय ने कहा कि याची किरायेदार है और उसके पास संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है इसलिए वह बिक्री पत्र को चुनौती नहीं दे सकता है, क्योंकि भूमिधर को अपनी संपत्ति बेचने से कोई रोक नहीं है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि याची ने जानबूझकर आंशिक रूप से ध्वस्त की गई संपत्ति की तस्वीरें प्रस्तुत की हैं ताकि अंतरिम राहत प्राप्त की जा सके जबकि वास्तव में संपत्ति पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी। तस्वीरों में कोई तिथि या समय नहीं है इसलिए उन्हें विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि राज्य सरकार ने वाराणसी शहर के दाल मंडी क्षेत्र में सड़क को चौड़ा करने के लिए 30 जुलाई 2025 को आदेश जारी किया था। इसमें जमीन को स्वामियों के सहमति से खरीदने का प्रवधान था। शहनवाज खान घर के मालिक थे, उन्होंने राज्यपाल के पक्ष में बिक्री पत्र निष्पादित किया और कब्जा सौंप दिया। परिसर खाली होने पर अधिकारियों ने इसे ध्वस्त कर दिया। याची ने बिक्री पत्र को चुनौती दी है। कोर्ट ने पाया कि याची यह नहीं बता सका कि उसने अंतरिम आदेश का पालन किया था या नहीं और क्या उसे इसके उल्लंघन के कारण बेदखल किया गया था। कोर्ट ने कहा कि ध्वस्तीकरण कब हुआ, यह तथ्यात्मक प्रश्न है, जिसका निर्धारण उचित प्रक्रिया में किया जाना चाहिए, न कि रिट क्षेत्राधिकार में। यदि संरचना ही ध्वस्त हो गई है तो किरायेदार को दी गई अंतरिम सुरक्षा का कोई महत्व नहीं है।