नई दिल्लीः देश में एंटीमाइक्रोबियल सिस्टेंट (एएमआर) अब केवल अस्पतालों और दवाओं की समत्त्या नहीं रह गई है। कृषि और नशुनाल्न, मुर्गीपालन व मत्स्य पालन में एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक और अनुचित उपयोग के कारण सिस्टेंट बैवर्टरिय कृषि उत्पादों और मांसहार के जरिये भोजन की थाली तक प्हुंच चुका है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगया
जा सकता है कि दुनिया में बनने वाली हर तीन में से दो एंटीबायोटिक दवाओं क इस्तेमाल इंसानों के इलाज के लिए नहीं, बल्कि दूध, नांस, अंड और मछली का उत्पादन बढ़ाने में है रहा है।
यही अंधाधुंध उपयोग एएमआर के अदृश्य म्हामारी बना रहा है और सामान्य संक्रमणें में इस्तेमाल होने बाली एंटीबायोटिक दवाएं धीरे-धीरे बेअसर होती जा रही हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि केंद्र सरकार के पशुपालन और मत्स्य उत्पादन
इस्तेमाल हो रहीं 37 एंटीमाइक्रोबियल दवाओं पर प्रतिबंध लगाना पड़ है। इन्में 18 एंटीबायोटिक, 18 एंटीवायरल और एक एंटी-प्रोटोजोअन दवा शामिल हैं। भारतीय खाद्य सुरक्ष अँर मानक प्रधिकरण (एफएसएसएआइ) ने भी दूध, मांस, अंडा, पोल्ट्री और मत्स्य उत्पादन में एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग पर सख्त रोक लगाई है।
पर्यावरण से जुड़ा गंभीर खतरा ये रेसिस्टेंट बैन्टीरिया पशुओं के सीधे संपर्क, उनके मल-मूत्र से दूषित
मिट्टी और जल स्रोतों के माध्यम से भी फैल रहे हैं। यही वजह है कि एएमआर अब जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण से जुड़ा गंभीर खतरा बन चुका है।
भरर्तय कृषि अनुसंधान परिष्द और इंडियन नेटवर्क फार फिशरीज एंड एनिमल एंटीमाइक्रोत्रियल रेसिस्टेंट से जुड़े विज्ञानियों का कहना है कि बमजोर जैव सुरक्षा, पशुओं की अनियमित चिकित्सकीय निगरानी और किसानों में जागरूकता की कमी इस संकट को और गहरा रही है।
83 प्रतिशत मरीज मल्टी ड्रग सिन्टेंट बैक्टीरिया के वाहक : मेडिकल जर्नल द लैंसेट और अन्य अध्ययनों में साम्ने अया है कि भारत के अस्पतालों में आने जले लगभग 83 प्रतेशत मरीज मल्टी डूग रेसिस्टेंट बैक्टीरिया के वाहक होते हैं। द लैंसेट में प्रकशित 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, यदि मौजूदा रुझान नहीं बदले तो 2023 से 2053 के बीच एएमआर से प्रतिवर्ष 3.5 करोड़ से अधिक मौतें हो सकती हैं।

