बाराबंकी : नैतिकता
का पाठ पढ़ाने वाले एक शिक्षक ने 15 साल तक व्यवस्था को धोखा दिया। शिक्षा विभाग में शिक्षक के साथ स्वास्थ्य विभाग में नान मेडिकल असिस्टेंट के पद पर एक साथ नौकरी कर वेतन लेता रहा। मुकदमे के 17 साल बाद आरोपित को अदालत ने दोषी ठहराते हुए सात साल कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
सतरिख के नरौली निवासी जयप्रकाश सिंह को 26 दिसंबर, 1979 को स्वास्थ्य विभाग में नान मेडिकल असिस्टेंट (एनएमए) के पद पर प्रतापगढ़ में नियुक्ति मिली थी। बाद में वह 19 जून, 1993 को शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापक की नौकरी हासिल कर बाराबंकी में नौकरी करने लगा। आरोपित एक साथ दोनों विभाग से वेतन लेता रहा, यह सिलसिला 2008 तक तक चलता रहा। कोतवाली नगर के आवास विकास कालोनी निवासी प्रभात सिंह ने मामले की शिकायत की तो पूरे प्रकरण का पटाक्षेप हुआ। इसके बाद तत्कालीन बेसिक शिक्षा अधिकारी ने एक अक्टूबर 2008 को उसे निलंबित कर दिया था। 2009 में आरोपित के खिलाफ कोतवाली नगर में मुकदमा लिखा गया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) सुधा सिंह की अदालत में चली सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी अनार सिंह ने साक्ष्य प्रस्तुत किए। सीजेएम सुधा सिंह ने आरोपित को दोषी करार देते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास
और 30 हजार रुपये अर्थदंड से दंडित किया है। मामले की शुरुआत वर्ष 2009 में दर्ज मुकदमे से हुई थी।
शिकायतकर्ता ने आरटीआइ के माध्यम से दोनों विभागों से वेतन का ब्यौरा प्राप्त किया, जिसके बाद पूरे प्रकरण का खुलासा हुआ। शिकायतकर्ता ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत दोनों विभागों से वेतन और सेवा से संबंधित अभिलेख प्राप्त कर अदालत में पेश किए। लगभग 17 वर्ष चली सुनवाई के बाद अदालत ने आरोपी को सजा दी। बाराबंकी और प्रतापगढ़ के उच्च अधिकारियों से 2008 को शिकायत हुई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस बीच शिकायत की जानकारी आरोपित को हो गई थी, जिसके बाद उसने अपनी चल-अचल संपत्ति अपने वारिसों के नाम कर दिया, जिससे वसूली न की जा सके।

