27 March 2026

होर्मुज बना 'इंटरनेट का कब्रिस्तान'! Jio और Airtel की सांसें अटकीं; सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों से कहा- बैकअप प्लान तैयार रखें...

 



भारत का अमेरिका और यूरोप के बीच होने वाला 33% डेटा ट्रैफिक इसी रास्ते से गुजरता है. अगर ईरान ने हॉर्मुज में केबल काटी, तो ई-कॉमर्स, शेयर बाजार और आईटी सेक्टर एक झटके में जमीन पर आ सकते हैं. सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों और समुद्र के नीचे केबल बिछाने वाली कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे जोखिम का आकलन करें और बैकअप प्लान तैयार रखें.





मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध का असर अब सिर्फ तेल या सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इंटरनेट और डेटा कनेक्टिविटी पर भी खतरा बढ़ गया है. इसी को देखते हुए भारत सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों और समुद्र के नीचे केबल बिछाने वाली कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे जोखिम का आकलन करें और बैकअप प्लान तैयार रखें. दरअसल, समुद्र के नीचे बिछी ये केबल्स ही दुनिया भर के इंटरनेट और डेटा ट्रैफिक की रीढ़ हैं.




Hormuz स्ट्रेट क्यों है इतना अहम


विशेषज्ञों के मुताबिक, Strait of Hormuz भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत का करीब एक-तिहाई डेटा ट्रैफिक इसी रास्ते से अमेरिका और यूरोप तक जाता है. ऐसे में अगर यहां कोई केबल डैमेज होती है, तो इसका सीधा असर इंटरनेट स्पीड और कनेक्टिविटी पर पड़ सकता है. सरकार के टेलीकॉम विभाग (DoT) ने इंडस्ट्री के साथ कई मीटिंग्स की हैं ताकि किसी भी इमरजेंसी के लिए तैयारी की जा सके. हालांकि कुछ ट्रैफिक को सिंगापुर के रास्ते डायवर्ट किया जा सकता है, लेकिन वह पूरे लोड को संभालने के लिए काफी नहीं होगा.




बैकअप रूट महंगे और धीमे


अगर केबल्स को दूसरे रास्तों से जोड़ा जाता है, तो यह प्रक्रिया न सिर्फ महंगी होगी बल्कि इंटरनेट की स्पीड भी प्रभावित हो सकती है. पैसिफिक रूट लंबा होने की वजह से डेटा ट्रांसफर में ज्यादा समय लगेगा, जिससे लेटेंसी बढ़ेगी और प्रोसेसिंग स्पीड धीमी हो सकती है. इसके अलावा, बड़ी टेक कंपनियां जैसे Amazon Web Services पहले से ही केबल कैपेसिटी का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर रही हैं, जिससे बाकी कंपनियों के लिए विकल्प और महंगे हो जाते हैं.




क्या-क्या सेवाएं हो सकती हैं प्रभावित


एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर केबल्स में किसी तरह की बड़ी गड़बड़ी होती है, तो इसका असर कई जरूरी सेवाओं पर पड़ सकता है. इसमें फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन फेल होना, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का डाउन होना और सोशल मीडिया आउटेज शामिल हैं. हालांकि, Sify Technologies के नेटवर्क बिजनेस हेड हर्षा राम के मुताबिक, पूरी तरह इंटरनेट बंद होने की संभावना कम है, क्योंकि कंपनियों ने पहले से कुछ बैकअप सिस्टम तैयार कर रखे हैं.




कंपनियों की तैयारी और चुनौतियां


भारत की बड़ी टेलीकॉम कंपनियां जैसे Reliance Jio, Bharti Airtel और Tata Communications इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं. हालांकि, अभी तक इन कंपनियों ने इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है. इंडस्ट्री के एक अधिकारी के मुताबिक, कंपनियां आमतौर पर छोटे-मोटे नुकसान के लिए तैयार रहती हैं, लेकिन युद्ध जैसी स्थिति के लिए किसी ने प्लान नहीं किया था.




केबल रिपेयर भी हुआ मुश्किल


रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के चलते इस इलाके में केबल रिपेयर करने वाले जहाजों ने काम रोक दिया है, क्योंकि सुरक्षा खतरा बहुत ज्यादा है. इससे पहले ही कई केबल्स सऊदी अरब के जेद्दा के पास डैमेज हो चुकी हैं, जिनमें Airtel और अन्य कंपनियों के नेटवर्क शामिल हैं. नई केबल्स जैसे Reliance Jio की India-Europe-Express और Google की Dhivaru भी इसी रूट पर बन रही हैं, जिससे भविष्य की योजनाएं भी खतरे में पड़ सकती हैं.




भारत के डेटा सेंटर प्लान पर असर


अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत के 270 बिलियन डॉलर के डेटा सेंटर प्लान पर भी असर पड़ सकता है. दरअसल, भारत अपनी डिजिटल इकोनॉमी को मजबूत करने के लिए बेहतर इंटरनेशनल कनेक्टिविटी पर निर्भर है. हाल ही में, Sundar Pichai ने भारत-अमेरिका कनेक्ट पहल की घोषणा की थी, जिसका मकसद नई केबल रूट्स बनाना है.




सरकार और इंडस्ट्री की रणनीति


इंडस्ट्री ने सरकार से यह भी अपील की है कि वह ईरान के साथ बातचीत करे ताकि इन केबल्स को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे. राहत की बात यह है कि कुछ भारतीय जहाजों को अभी भी इस क्षेत्र से गुजरने की अनुमति मिल रही है.