प्रयागराज। प्रदेश सरकार ने परिषदीय उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत अंशकालिक अनुदेशकों का मानदेय तो प्रतिमाह 17 हजार रुपये कर दिया है लेकिन उनके लाखों रुपये का भुगतान करने को तैयार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने चार फरवरी को अनुदेशकों के मानदेय में एक अप्रैल से वृद्धि करते हुए 2017-18 से बकाया का भुगतान छह महीने में करने का आदेश दिया था। प्रदेश में 2013 से कला शिक्षा, स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा तथा कार्यअनुभव शिक्षा के पद पर कार्यरत 24717 अनुदेशकों में से प्रत्येक को नौ-नौ लाख रुपये से अधिक का बकाया भुगतान होना था।
शीर्ष कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया था कि पहले राज्य सरकार भुगतान करेगी और बाद में केंद्र सरकार से अपने हिस्से की धनराशि प्राप्त करेगी। हालांकि राज्य सरकार ने भुगतान करने की बजाय नौ मार्च 2026 को पुनर्विचार याचिका, सात मई को स्थगन प्रार्थना पत्र तथा 12 मई को संशोधन प्रार्थना पत्र दाखिल किया। इनमें मुख्य रूप से बकाया भुगतान में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी का मुद्दा उठाया गया है। वर्तमान में ये सभी प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं।
आरटीई के तहत अंशकालिक अनुदेशकों की नियुक्ति जुलाई 2013 में सात हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय एवं 11 माह की सेवा शर्तों पर की गई थी। 2016 में मानदेय बढ़ाकर 8470 रुपये किया गया। 2017 में शासन ने 17 हजार रुपये मानदेय निर्धारित किया था लेकिन दिसंबर 2017 में पुनर्विचार के नाम पर पुनः 8470 रुपये ही भुगतान किया जाने लगा और 17 हजार मानदेय नहीं मिल सका। इसके खिलाफ अनुदेशकों ने हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी और चार फरवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
मार्च 2017 से 17 हजार रुपये के हिसाब से एरियर पाना हमारा हक है और यह हमें मिलना ही चाहिए। इसके लिए हम राज्य सरकार से भी अनुरोध करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाएंगे। -भोलानाथ पांडेय, याचिकाकर्ता

