18 September 2026

'सदी बदल गई; समान काम के लिए समान वेतन का दावा नहीं कर सकते'; SC ने कह दी बड़ी बात, लेकिन क्यों?

 

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि सिर्फ़ इसलिए किसी कर्मचारी को समान काम के लिए समान वेतन नहीं दिया जा सकता क्योंकि उनके एक जैसे काम और जिम्मेदारियां हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि सिर्फ ऐसा होने से ही कोई कर्मचारी संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत "समान काम के लिए समान वेतन" के अधिकार का दावा नहीं कर सकता। जीपी संगीता बनाम केरल राज्य और अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने प्रमोशन या ट्रांसफर से नियुक्त शिक्षकों के लिए उनके पिछले सर्विस अनुभव के कारण ज़्यादा वेतनमान को सही ठहराया।




बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने कहा कि वेतन समानता के लिए कानूनी मानक समय के साथ बदले हैं। कोर्ट ने कहा, "पिछली सदी में, इस कोर्ट ने समान काम के लिए समान वेतन को आर्टिकल 14 और 39(d) के तहत शोषण-विरोधी सिद्धांत के तौर पर देखा था, जहां समानता का दावा करने के लिए सिर्फ़ पद का एक जैसा होना ही काफी था। हालाँकि, इस सदी में इस सिद्धांत को सर्विस नियमों पर आधारित एक कड़े टेस्ट के तौर पर फिर से तय किया गया है। ऐसे कई फैसले हैं, जिनमें कहा गया है कि सिर्फ़ एक जैसा काम दिखाकर समान वेतन का दावा नहीं किया जा सकता; दावा करने वाले कर्मचारी को भर्ती के स्रोत, शैक्षणिक योग्यता और अनुभव में पूरी समानता भी साबित करनी होगी।"


पूरा मामला क्या?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट उन अपीलों पर सुनवाई कर रहा था, जो सीधे भर्ती किए गए जूनियर हायर सेकेंडरी स्कूल शिक्षकों ने केरल हाई कोर्ट के मार्च 2011 के फैसले को चुनौती देते हुए दायर की थीं। हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच ने सिंगल-जज के आदेश को पलट दिया था और कहा था कि प्रमोशन से आए शिक्षक एक अलग वर्ग बनाते हैं क्योंकि वे पहले लंबी सर्विस वाले फुल-टाइम स्थायी लोअर स्कूल शिक्षक थे। हाई कोर्ट ने कहा कि उन्हें फुल-टाइम पे-स्केल देना उनकी पिछली सर्विस और स्टेटस की सुरक्षा को सही ढंग से मान्यता देना था, जबकि सीधे भर्ती होने वाले शिक्षक फ्रेशर के तौर पर आए थे।


इस फैसले से नाराज होकर, सीधे भर्ती किए गए शिक्षक सुप्रीम कोर्ट पहुच गए। सुप्रीम कोर्ट के सामने इन शिक्षकों ने तर्क दिया कि सीधे भर्ती होने वाले और प्रमोशन से आए शिक्षक समान काम के बोझ के साथ एक जैसे काम करते हैं, और एक ही कैडर में पे-स्केल में अंतर रखना गंभीर भेदभाव है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि समान वेतन के सिद्धांत को बिना सोचे-समझे लागू करने से बचना चाहिए।


कलकत्ता हाई कोर्ट का जिक्र

सुप्रीम कोर्ट ने पहले के तय फैसलों का हवाला देते हुए कहा, "आर्टिकल 14 भर्ती किए गए और एक साथ रखे गए लोगों के गुणों या विशेषताओं के आधार पर उचित वर्गीकरण की अनुमति देता है। सर्विस के मामलों में, प्रशासन में कुशलता को बढ़ावा देने के लिए वेतन के मकसद से योग्यता या अनुभव वर्गीकरण का सही आधार हो सकता है।" अपील करने वालों ने 'स्टेट ऑफ़ वेस्ट बंगाल बनाम अनिर्बान घोष' मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को 'पर इनक्युरियम' (कानूनी नियमों की अनदेखी करके दिया गया फैसला) करार दिया, क्योंकि वह सुप्रीम कोर्ट के पहले के बाध्यकारी फैसलों के खिलाफ था। कोर्ट ने माना कि प्रमोशन पाने वालों के लिए ज़्यादा वेतनमान को सही ठहराने के लिए अनुभव एक सही और समझने योग्य आधार है। इसलिए, कोर्ट को हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने की कोई वजह नहीं दिखी।