संपत्ति, मकान या जमीन (Property) बेचने से हुए मुनाफे पर देना होता है टैक्स, ऐसे समझें टैक्स और बचत का गणित

कोरोना काल के बाद बड़े मकानों की मांग बढ़ी है। लोग पुराना मकान या अन्य संपत्ति बेचकर अपने लिए बड़ा घर खरीद रहे हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि मकान या संपत्ति बेचने से हुए मुनाफे पर टैक्स का भुगतान करना पड़ता है।




दरअसल, मकान बेचकर हुए मुनाफे पर दो तरह से टैक्स की गणना होती है। तीन साल अपने पास रखने के बाद अगर आपने मकान बेचा है तो इससे हुए मुनाफे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (एलटीसीजी) माना जाएगा। इस अवधि से पहले मकान बेचने पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स (एसटीसीजी) माना जाएगा।


एसटीसीजी को अतिरिक्त कमाई माना जाता है इसलिए इस पर स्लैब के हिसाब से टैक्स का भुगतान करना पड़ता है। वहीं, एलटीसीजी पर महंगाई के सापेक्ष इंडेक्सेशन का लाभ लेने के बाद शेष बची राशि पर 20 फीसदी दर से टैक्स चुकाना पड़ेगा। इसके अलावा, तीन फीसदी उपकर भी लगेगा। मुनाफे की गणना संपत्ति खरीदने में खर्च राशि और उसके मरम्मत खर्च को घटाकर की जाती है।

बचत के उपाय... दूसरा घर खरीदें या बनाएं
मकान की बिक्री से लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स हुआ है तो इस रकम का इस्तेमाल दूसरा घर खरीदने में कर सकते हैं। ऐसा करके आप टैक्स देनदारी से बच सकते हैं। यह छूट मकान की बिक्री के दो साल के भीतर रेडी-टू-मूव (तैयार) मकान खरीदने पर मिलेगी।
अगर मकान बेचने से एक साल पहले भी दूसरा घर खरीदा है तो भी टैक्स छूट का लाभ ले सकते हैं।
अगर राशि दो करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं है तो एक मकान बेचने से हुए लाभ का इस्तेमाल दो मकान खरीदने में कर सकते हैं। यह सुविधा एक ही बार मिलती है।

बैंक में भी कर सकते हैं जमा
मकान की बिक्री से हुए लाभ को निवेश करने के लिए भले ही आपको दो-तीन साल का समय मिलता हो, लेकिन बिक्री के बाद भरे जाने वाले आयकर रिटर्न (आईटीआर) में इसकी जानकारी देनी होगी। अगर आप तब तक निवेश नहीं कर पाते हैं तो लाभ की राशि को बैंकों के कैपिटल गेन अकाउंट स्कीम में डाल सकते हैं। निर्धारित समय तक इस पर टैक्स नहीं लगेगा।

सरकारी बॉन्ड में लगा सकते हैं पैसा
मकान बेचने की तारीख से 6 महीने के भीतर सरकारी बॉन्ड में निवेश कर भी टैक्स बचा सकते हैं। एनएचएआई, ग्रामीण विद्युतीकरण निगम, रेलवे वित्त निगम के कैपिटल गेन बॉन्ड में निवेश कर पूंजीगत लाभ की राशि पर टैक्स बचा सकते हैं। इसमें निवेश की अवधि 5 साल होती है। इस पर हर साल 5.25 फीसदी ब्याज मिलता है, जिस पर टैक्स लगता है। -गिरीश नारंग, टैक्स सलाहकार