10 January 2026

स्थायी बीएलओ की अनिवार्यता: चुनावी कार्यों में उलझते शिक्षक और बाधित होती बच्चों की शिक्षा

 

_स्थायी बीएलओ की नियुक्ति की आवश्यकता_


_देश के नौनिहालों की शिक्षा व्यवस्था में बाधक बनता निर्वाचन कार्य_


✍️ Anand Prakash Gupta जी की कलम से -

  

            वर्ष 2009 में संसद द्वारा निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया गया था। इस कानून से यह उम्मीद जगी थी कि देश के गरीब, वंचित और पिछड़े वर्ग के बच्चों को समान अवसरों के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकेगी। इस अधिनियम में छात्र-शिक्षक अनुपात, विद्यालयों के लिए न्यूनतम मानक, कार्य दिवसों और शिक्षण घंटों की संख्या स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई थी।

            अधिनियम की धारा 21(3) में यह भी प्रावधान किया गया है कि शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक कार्य नहीं लिए जाएंगे, हालांकि स्थानीय निकाय संबंधी निर्वाचन कार्यों को इसमें अपवाद के रूप में रखा गया है। लेकिन आज यही अपवाद नियम बन चुका है।

          पहले निर्वाचन कार्य केवल चुनाव के समय ही होता था और उसी अवधि में बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) की नियुक्ति की जाती थी। अब स्थिति यह है कि बीएलओ का कार्य पूर्णकालिक हो गया है। मतदाता सूची पुनरीक्षण, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), नए मतदाताओं का पंजीकरण, सत्यापन, सुधार—यह सब निरंतर चलता रहता है।

        चिंताजनक तथ्य यह है कि इस कार्य के लिए सर्वाधिक संख्या में शिक्षकों को ही नियुक्त किया जाता है। जबकि निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों में यह कहा गया है कि शिक्षकों को अंतिम विकल्प के रूप में ही बीएलओ बनाया जाए, परंतु स्थानीय प्रशासन उन्हें प्राथमिकता पर इस कार्य में लगा देता है।

           शैक्षिक सत्र 2025–26 इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। एसआईआर का कार्य नवंबर 2025 से शुरू होकर अप्रैल 2026 तक चलने की संभावना है।                    

           इसका अर्थ है कि लगभग पाँच महीने तक अनेक शिक्षक अपने विद्यालयों में नियमित शिक्षण कार्य नहीं कर पाए। इन पाँच महीनों में उन विद्यार्थियों की शिक्षा गंभीर रूप से प्रभावित हुई है, जिनके शिक्षक बीएलओ बनाए गए।      

         यह बच्चों के जीवन का सबसे संवेदनशील और निर्णायक समय होता है, जब उनके व्यक्तित्व और भविष्य की नींव रखी जाती है। इस अवधि में आई शैक्षिक क्षति की भरपाई लगभग असंभव है।

          भारत एक लोकतांत्रिक देश है और निर्वाचन आयोग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आयोग अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करता है, लेकिन उसके पास अपना स्वतंत्र मानव संसाधन ढांचा नहीं है। वह राज्य सरकार के कर्मचारियों पर निर्भर रहता है।

          राज्य सरकार के अधीन होने के कारण बीएलओ पर राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव भी पड़ता है, जिससे निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं और आयोग भी आलोचना के घेरे में आ जाता है।

अब समय आ गया है कि निर्वाचन आयोग अपने कार्यों की निरंतरता को देखते हुए एक स्थायी और स्वतंत्र कार्मिक व्यवस्था विकसित करे। संविदा के आधार पर बीएलओ की नियुक्ति की जा सकती है। देश में शिक्षित बेरोजगार युवाओं की कोई कमी नहीं है।

         यदि ग्राम पंचायत स्तर पर या 3–4 बूथों के समूह पर एक स्थायी बीएलओ नियुक्त किया जाए, तो न केवल चुनावी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और प्रभावी होगी, बल्कि शिक्षकों को भी उनके मूल दायित्व—शिक्षण—से विमुख नहीं होना पड़ेगा।

देश का भविष्य आज की कक्षा में बैठा है। यदि हम उसके वर्तमान से समझौता करेंगे, तो भविष्य की कीमत हमें बहुत भारी चुकानी पड़ेगी। इसलिए आवश्यक है कि निर्वाचन व्यवस्था को मजबूत करते हुए शिक्षा व्यवस्था को कमजोर न किया जाए। स्थायी बीएलओ की नियुक्ति इसी दिशा में एक अनिवार्य कदम है।


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