एक महत्वपूर्ण तथ्य —2017 के संशोधन को लेकर
देश व प्रदेश के समस्त शिक्षक साथियों एवं सम्मानित शिक्षक संगठनों के पदाधिकारियों से विनम्र आग्रह है कि 2017 के संशोधन को लेकर फैलाई जा रही भ्रांतियों को तथ्यों के आधार पर समझने का प्रयास करें। लगातार यह प्रचारित किया जा रहा है कि भारत सरकार ने वर्ष 2017 में RTE Act 2009 की धारा 23(2) में ऐसा संशोधन कर दिया जिसके कारण माननीय सर्वोच्च न्यायालय को सभी के लिए TET अनिवार्य करना पड़ा, जबकि उपलब्ध अधिनियम, अधिसूचनाओं एवं विधिक तथ्यों का अध्ययन कुछ अलग स्थिति प्रस्तुत करता है। यह निर्णय नियमों के आधार पर नहीं बल्कि अधिकार क्षेत्र के आधार पर दिया गया एक ऐसा त्रुटिपूर्ण निर्णय है, जो वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के प्रति पूर्णतया अन्यायपूर्ण प्रभाव उत्पन्न करता है।
जैसा कि पूर्व में वर्ष 2017 का संशोधन मूलतः उन अप्रशिक्षित शिक्षकों के लिए था जो RTE Act लागू होने के बाद निर्धारित समय सीमा तक न्यूनतम अर्हता/प्रशिक्षण प्राप्त नहीं कर सके थे।
RTE Act 2009 की धारा 23(2) में पहले से यह व्यवस्था थी कि जिन शिक्षकों के पास अधिनियम लागू होने के समय निर्धारित न्यूनतम योग्यता नहीं थी, उन्हें उसे प्राप्त करने हेतु समय दिया जाएगा। बाद में 10 अगस्त 2017 के संशोधन में केवल यह जोड़ा गया कि 31 मार्च 2015 तक नियुक्त या कार्यरत ऐसे शिक्षक चार वर्ष के भीतर न्यूनतम अर्हता प्राप्त करेंगे।
यही तथ्य तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री माननीय प्रकाश जावड़ेकर जी ने भी संसद में अपने वक्तव्य के माध्यम से स्पष्ट किया था कि यह संशोधन मूलतः उन शिक्षकों को अतिरिक्त समय देने के उद्देश्य से लाया गया था जो निर्धारित अवधि में आवश्यक योग्यता/प्रशिक्षण पूर्ण नहीं कर सके थे।
अर्थात यह संशोधन किसी नई अनिवार्यता को जन्म देने वाला नहीं था, बल्कि पहले से लंबित प्रशिक्षण अवधि को आगे बढ़ाने से संबंधित था।इतना ही नहीं, 10 अक्टूबर 2017 की अधिसूचना में यह भी उल्लेखित किया गया कि यह व्यवस्था 1 अप्रैल 2015 से लागू मानी जाएगी, किंतु इसका retrospective effect किसी व्यक्ति के हितों के प्रतिकूल नहीं होगा।
हमारा स्पष्ट मत है कि NCTE ने कभी यह नहीं कहा कि RTE Act लागू होने से पूर्व नियुक्त सभी शिक्षकों पर यह व्यवस्था स्वतः लागू होगी। यही कारण है कि इस पूरे विषय को केवल भावनाओं या सुनी-सुनाई बातों के आधार पर नहीं, बल्कि अधिनियम, अधिसूचना, संसदीय वक्तव्यों एवं विधिक अध्ययन के आधार पर समझने की आवश्यकता है।
यह भी एक गंभीर चिंतन का विषय है कि यदि वास्तव में वर्ष 2017 में ऐसा कोई संशोधन किया गया होता, जिसके तहत पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर TET स्वतः अनिवार्य हो गया होता, तो क्या वह संशोधन मात्र कागजी कार्यवाही बनकर रह जाता ?
वर्ष 2017 से 2025 तक लगभग आठ वर्षों की अवधि में देश की किसी संवैधानिक संस्था, किसी राज्य सरकार, किसी शिक्षा विभाग, किसी शिक्षाविद्, किसी विधि विशेषज्ञ अथवा किसी सक्षम प्राधिकारी ने इसे लागू कराने की पहल क्यों नहीं की ?
देश में 28 राज्य एवं 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं। क्या यह माना जाए कि यह सभी माननीय न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे ?*
अथवा यह सोचने का विषय है कि जिस प्रकार इस प्रावधान की व्याख्या आज प्रस्तुत की जा रही है, वैसी समझ पहले कभी प्रशासनिक, शैक्षणिक अथवा विधिक स्तर पर स्वीकार ही नहीं की गई थी।
इसीलिए यह विषय गहन अध्ययन और गंभीर विमर्श की मांग करता है। यदि अब भी किसी सम्मानित साथी, संगठन अथवा पदाधिकारी को इस विषय में भ्रम है, तो विनम्र अपील है कि वे अपने किसी सक्षम विधि विशेषज्ञ से इन तथ्यों को अवश्य समझें। क्योंकि जब तक हमारी माँगें, हमारी व्याख्या और हमारी लड़ाई की दिशा सही नहीं होगी, तब तक निर्णय भी हमारे विपरीत जाने की संभावना बनी रहेगी।
आज आवश्यकता भावनात्मक प्रतिक्रियाओं की नहीं, बल्कि सही विधिक समझ, सही तथ्यों और सही मुद्दों पर केंद्रित संघर्ष की है।
इसलिए देश व प्रदेश के सभी शिक्षकों तथा सम्मानित शिक्षक संगठनों के मुखियाओं से हाथ जोड़कर अपील है — सबसे पहले अपने मुद्दे को सही रूप में समझिए, अधिनियमों, अधिसूचनाओं एवं विधिक पक्ष का गंभीर अध्ययन करिए; तभी हमारी लड़ाई मजबूत, प्रभावी और परिणामकारी हो सकेगी।
गलत लड़ाई का हस्र सबके सामने है।
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