बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी में बड़ा विवाद: बीएड की किताब में भारतीयों को बताया 'कमजोर दिमाग' और 'निर्णय लेने में अयोग्य'
वाराणसी: एक तरफ जहां देश को वैश्विक पटल पर 'विश्वगुरु' बनाने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश की उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम से एक ऐसा हैरान करने वाला मामला सामने आया है जिसने पूरी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (Bundelkhand University) के बीएड (B.Ed) पाठ्यक्रम की एक पुस्तक में भारतीयों की बौद्धिक और मानसिक क्षमता को लेकर बेहद आपत्तिजनक और अपमानजनक बातें लिखी गई हैं।
शैक्षिक सत्र 2026-27 के लिए बीएड प्रथम वर्ष के अनिवार्य प्रश्नपत्र 'शिक्षा में दार्शनिक एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य' के सिलेबस में शामिल एक किताब इस समय भारी विवादों में घिर गई है।
किताब में क्या लिखा है?
विवाद की जड़ पुस्तक के 'वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्य' अध्याय के अंतर्गत आने वाला एक शीर्षक है, जिसका नाम 'मानसिक स्वास्थ्य का विकास' है। इस चैप्टर में सीधे तौर पर करोड़ों भारतीयों की सोच पर प्रहार करते हुए लिखा गया है:
"भारतीयों का मानसिक स्वास्थ्य निम्न (कमतर) स्तर का है और वे विचार करने, तर्क करने तथा निर्णय लेने में हमेशा अयोग्य रहते हैं।"
इतना ही नहीं, पुस्तक में आगे यह भी तर्क दिया गया है कि चूंकि भारतीयों की मानसिक स्थिति कमजोर है, इसलिए शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य के विकास का उद्देश्य निर्धारित करना बेहद जरूरी है। इसे वर्तमान भारतीय शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बताया गया है।
अज्ञात 'विशेषज्ञ' और पब्लिकेशन पर सवाल
हैरानी की बात यह है कि इस पुस्तक को कुमार पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित किया गया है, लेकिन इसके कवर या अंदर कहीं भी मुख्य लेखक का नाम दर्ज नहीं है। लेखक के नाम की जगह केवल 'विषय विशेषज्ञ द्वारा' (By Subject Specialist) लिखा गया है। अब शिक्षाविदों के बीच यह बहस छिड़ गई है कि आखिर किस आधार पर और किस 'विशेषज्ञ' ने करोड़ों भारतीयों की बौद्धिक क्षमता को इस तरह एक झटके में खारिज कर दिया, और इसे यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में शामिल कैसे होने दिया गया।
शिक्षा जगत में आक्रोश, जांच के आदेश
इस अपमानजनक टिप्पणी के सामने आने के बाद शिक्षा विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों में भारी नाराजगी है। आईयूसीटीई (IUCTE) के निदेशक प्रो. प्रेम नारायण सिंह ने इस सामग्री पर सख्त आपत्ति जताते हुए कहा, "यह सामग्री नितांत आपत्तिजनक है। भारतीयों की तर्क क्षमता की मिसाल तो पूरी दुनिया और विदेशों में दी जाती है। हमारे 'निर्णय सिंधु' जैसे महान ग्रंथों ने पूरे विश्व को राह दिखाई है। यह लिखना भारतीयों और भारत की मनीषा का सीधा अपमान है।"
मामला तूल पकड़ते ही विश्वविद्यालय प्रशासन भी बैकफुट पर आ गया है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलसचिव ज्ञानेंद्र कुमार ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा, "यह मामला अभी तक मेरे संज्ञान में नहीं आया था। लेकिन यदि पुस्तक में ऐसी कोई भी टिप्पणी की गई है, तो वह पूरी तरह से गलत है। इस पूरे मामले को गंभीरता से दिखवाया जाएगा और इसकी उचित जांच कराई जाएगी।"
अब देखना यह होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस विवादित पुस्तक को पाठ्यक्रम से कब तक हटाता है और इसके प्रकाशक व कथित 'विशेषज्ञों' पर क्या कार्रवाई की जाती है।

