उत्तर प्रदेश में शिक्षकों के लिए TET (Teacher Eligibility Test) की संभावित अनिवार्यता को लेकर शिक्षक समुदाय के एक बड़े वर्ग में चिंता और असंतोष दिखाई दे रहा है। कई शिक्षक संगठनों और शिक्षकों का मानना है कि नियुक्ति के वर्षों बाद दोबारा TET की बाध्यता उचित नहीं है और इससे हजारों शिक्षकों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।
शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने नियुक्ति के समय सरकार द्वारा निर्धारित सभी सेवा शर्तों को पूरा किया था तथा कड़ी चयन प्रक्रिया के बाद हजारों अभ्यर्थियों को पीछे छोड़कर नौकरी प्राप्त की थी। ऐसे में सेवा के लंबे समय बाद पुनः TET को अनिवार्य बनाना उनके साथ न्यायसंगत नहीं होगा।
कुछ शिक्षकों का यह भी तर्क है कि वर्तमान में अनेक शिक्षक ऐसे हैं जो वर्षों से विद्यालयों में सफलतापूर्वक शिक्षण कार्य कर रहे हैं। यदि उनके लिए दोबारा TET परीक्षा अनिवार्य की जाती है और वे किसी कारणवश परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाते हैं, तो उनकी नौकरी और भविष्य दोनों संकट में पड़ सकते हैं।
विरोध कर रहे शिक्षकों का कहना है कि नेतृत्व का उद्देश्य केवल कुछ लोगों के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि सभी शिक्षकों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाना होना चाहिए। उनका मानना है कि मुख्यमंत्री और सरकार के समक्ष यह मांग रखी जानी चाहिए कि वर्षों से कार्यरत शिक्षकों को TET की अनिवार्यता से छूट प्रदान की जाए।
शिक्षक समुदाय के एक वर्ग ने "एक मांग – TET से मुक्ति" का नारा देते हुए कहा है कि यदि इस विषय पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो बड़ी संख्या में शिक्षक विरोध प्रदर्शन के लिए मजबूर हो सकते हैं।
हालांकि इस मुद्दे पर विभिन्न शिक्षक संगठनों और शिक्षकों के अलग-अलग विचार हैं। कुछ लोग TET को शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आवश्यक मानते हैं, जबकि अन्य इसे वर्षों से कार्यरत शिक्षकों के लिए अनावश्यक बोझ मान रहे हैं।
फिलहाल शिक्षक समुदाय की निगाहें सरकार और शिक्षा विभाग के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। आने वाले समय में इस विषय पर कोई स्पष्ट नीति या निर्णय सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

