नई दिल्ली, जूनियर हाई स्कूलों में कार्यरत 25 हजार अनुदेशकों के वेतन बढ़ोतरी मुद्दे पर यूपी सरकार को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने 4 फरवरी के अपने फैसले की समीक्षा करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने महज 7 हजार रुपये मासिक मानदेय पर कार्यरत अनुदेशकों का मानदेय बढ़ा दिया था। साथ ही यह भी कहा था कि अनुबंध खत्म होने के बाद उनकी नियुक्ति स्थायी मानी जाएगी।
जस्टिस विक्रम नाथ और पी.बी. वराले की पीठ ने इस फैसले की समीक्षा की मांग को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। पीठ ने एक पन्ने के अपने आदेश में कहा कि 4 फरवरी, 2026 को पारित फैसले में किसी तरह की कोई खामी नहीं है। उक्त फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एक दशक से भी अधिक समय से इन अनुबंधित अनुदेशकों को महज 7 हजार रुपये मासिक मानदेय पर रखना एक अनुचित प्रथा है जो बंधुआ मजदूरी/बेगार के समान है। यह संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत यह पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
पीठ ने अनुदेशकों को वित्तीय वर्ष 2017-18 से 17 हजार रुपये मासिक के हिसाब से वेतन देने का आदेश दिया था। पीठ ने यूपी सरकार को आदेश दिया है कि वह 1 अप्रैल, 2026 से इस श्रेणी के अनुदेशकों को 17,000 रुपये प्रति माह की दर से मानदेय देना शुरू करें और छह माह में बकाया रकम का भुगतान करें।
24 July 2026
यूपी में अनुदेशकों को 2017 से ही बढ़ा मानदेय मिलेगा, उत्तर प्रदेश सरकार की दलील ठुकराई, जानिए क्या क्या खा कोर्ट ने
उत्तर प्रदेश सरकार की दलील ठुकराई
● सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज की
● अनुबंध खत्म होने के बाद अनुदेशकों की नियुक्ति स्थायी मानें : कोर्ट
सरकार ने दलील दी थी कि केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना के लिए केंद्र से पैसा नहीं मिलने के बाद राज्य सरकार को पूरा मानदेय देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। इसे कोर्ट ने ठुकरा दिया था। कहा था कि ये अनुदेशक जो लगातार दस साल से अधिक समय से काम कर रहे हैं, उन्हें स्थायी रूप से नियुक्त माना जाएगा। समय के साथ और काम की निरंतरता को ध्यान में रखते हुए ऐसे पद अपने आप बन जाते हैं।

