सुबह के ठीक 6:45 पर बजे प्रभारी प्रधानाध्यापक जी ने स्कूल के लिए घर से निकलने के पहले चाय का पहला घूंट ही लिया था कि मोबाइल ने राष्ट्रनिर्माण का शंखनाद कर दिया। व्हाट्सऐप समूह में पहला संदेश आया "आप सभी को निर्देशित किया जाता है..."।
गुरुजी ने सोचा, चलो आज का पहला आदेश है। स्कूल पहुंच तक दूसरा, तीसरा, चौथा... फिर मोबाइल ऐसा बजने लगा मानो विद्यालय नहीं, शेयर मार्केट खुल गया हो। हर संदेश की शुरुआत एक जैसी और अंत भी लगभग एक जैसा "आज ही पूर्ण करें", "तत्काल सुनिश्चित करें", "दो दिवस में निस्तारण करें", "किसी प्रकार की शिथिलता न बरती जाए", "अन्यथा कार्यवाही प्रस्तावित की जाएगी।" केवल नीचे लिखा नाम बदलता रहता, कभी आदेशानुसार खंड शिक्षा अधिकारी, कभी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, कभी महानिदेशक, स्कूली शिक्षा।
गुरुजी ने सोचा, आज बच्चों को पढ़ाएँ या राष्ट्र की डिजिटल आत्मा को बचाएँ? तभी पहला आदेश बोला "अपार आईडी पूरी करो।" दूसरा बोला "नामांकन का अंतर खत्म करो।" तीसरा चिल्लाया। "डबल नामांकन हटाओ।" चौथा गला फाड़ चिल्लाया "पीएफएमएस की उम्र सत्यापित करो।" पाँचवाँ याद दिलाने लगा "एमबीयू दो दिन में पूरा हो।" छठा बोला "यू-डायस ड्रॉप बॉक्स वाले बच्चों को इम्पोर्ट कराओ।" सातवाँ गरजा "निपुण प्लस अपडेट करो।" आठवाँ मुस्कुराया "समग्र प्रगति पत्र और पुस्तकालय की किताबें भी बीआरसी से ले जाना मत भूलना।"
इतने में ब्लॉक से संदेश आया "आज 11:30 बजे राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस की ऑनलाइन बैठक अनिवार्य है।" गुरुजी ने घड़ी देखी। उसी समय एएनएम टीकाकरण के लिए आने वाली थीं। उधर रसोइया पूछ रही थी "आज फल कितने बच्चों को देना है?" तभी दूसरा संदेश "फल लाभार्थियों की हार्ड कॉपी बीआरसी में जमा करें।" तभी तीसरा "रसोइयों की उपस्थिति भी साथ भेजें।"
बच्चे तब तक प्रार्थना के बाद अपनी अपनी कक्षाओं में पहुंच चुके थे। एक बच्चा बोला, "गुरुजी, आज गणित पढ़ाएँगे?" गुरुजी ने मोबाइल की ओर देखा और बड़े प्यार से बोले, "बेटा, आज अगर समय बच गया तो जरूर पढ़ाएँगे। पहले देश को यह बता दें कि तुम किस कक्षा में हो, किस पोर्टल पर हो, किस ऐप में हो, किस सूची में हो, किस ड्रॉप बॉक्स में हो, किस आधार से जुड़े हो और किस बैंक खाते में तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है।"
तभी एक नया आदेश आया "किचन गार्डन की फोटो भेजिए।" फोटो भेजते-भेजते याद आया कि सोख्ता गड्ढे और रेन वाटर हार्वेस्टिंग यूनिट का जीपीएस फोटो भी चाहिए। उधर किसी ने याद दिलाया "हमारा ब्लॉक नवोदय फॉर्म में पीछे चल रहा है, हर विद्यालय कम से कम दो फॉर्म भरवा दे, तो ब्लॉक टॉप कर जाए" अब गुरुजी सोचने लगे कि वे शिक्षक हैं, डेटा एंट्री ऑपरेटर हैं, सर्वेक्षक हैं, बैंक मित्र हैं, आधार केंद्र हैं, पोर्टल विशेषज्ञ हैं, फोटोग्राफर हैं, सोशल मीडिया मैनेजर हैं, स्वास्थ्य समन्वयक हैं, पर्यावरण अभियंता हैं या फिर बीच-बीच में बच्चों को पढ़ा भी दिया करें।
दोपहर तक एक नया संदेश आया "निपुण लक्ष्य और कैच-अप के पोस्टर आज ही लग जाएँ, फोटो जनपद तक भेजी जाए।" गुरुजी ने हिम्मत करके पूछा, "सर, पोस्टर लगाने के बाद बच्चों को भी पढ़ा दें?" जवाब नहीं आया, लेकिन पाँच मिनट बाद एक और आदेश आ गया "कार्य में शिथिलता पाए जाने पर संबंधित प्रधानाध्यापक उत्तरदायी होंगे।"
शाम को घर लौटते समय पत्नी ने पूछा, "आज स्कूल में क्या पढ़ाया?" गुरुजी कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, "आज मैंने बच्चों को नहीं, पोर्टलों को संतुष्ट किया है। आज मैंने शिक्षा कम और प्रमाण अधिक दिए हैं। आज मैंने यह सिद्ध किया है कि हमारा विद्यालय जीवित है, बच्चे जीवित हैं, रसोइया जीवित है, किचन गार्डन जीवित है, सोख्ता गड्ढा जीवित है, पोस्टर जीवित हैं, ऐप जीवित है, पोर्टल जीवित है... बस यह पता नहीं चल पाया कि कक्षा में पढ़ाई कितनी जीवित रही।"
रात को सोने से पहले उन्होंने मोबाइल साइलेंट किया ही था कि अंतिम संदेश चमका "सभी प्रधानाध्यापक ध्यान दें, यह अत्यंत आवश्यक एवं सर्वोच्च प्राथमिकता का कार्य है। तत्काल अनुपालन सुनिश्चित करें।"
गुरुजी मुस्कुराए। उन्हें समझ में आ गया कि बेसिक शिक्षा में अब प्राथमिकता की भी पदोन्नति हो चुकी है। यहाँ हर काम "सर्वोच्च प्राथमिकता" है, केवल पढ़ाना छोड़कर। बाकी सब आदेशों के नीचे अलग-अलग हस्ताक्षर होते हैं, पर उनका सार एक ही रहता है और इन सब के बीच कहीं सबसे छोटा, सबसे मौन और सबसे उपेक्षित पात्र बैठा रहता है— "कक्षा में शिक्षक का इंतज़ार करता बच्चा"।
✍️ देवेंद्र दत्त त्रिवेदी
(सेवानिवृत्त शिक्षक)
