सरकारी कर्मचारी पर एफआईआर से पहले उसका पक्ष सुनना जरूरी
गौतमबुद्ध नगर के एक अस्पताल का मामला, हाईकोर्ट ने रद्द की एफआईआर
संवाद न्यूज एजेंसी प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए कथित अपराध की शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को संबंधित कर्मचारी का पक्ष सुनना जरूरी है। बीएनएसएस की धारा 175(4) के तहत मिली इस कानूनी सुरक्षा की अनदेखी कर एफआईआर का आदेश नहीं दिया जा सकता।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की अदालत ने गौतमबुद्ध नगर के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम का आदेश रद्द करते हुए डॉ. राहुल वर्मा को राहत दी है। मामला गौतमबुद्ध नगर के यथार्थ अस्पताल में हुई एक सर्जरी से जुड़ा है। शिकायतकर्ता धीरेंद्र ने बताया कि 31 मई 2025 को उसकी पत्नी की लैप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टॉमी सर्जरी हुई थी।
अदालत से
आरोप था कि ऑपरेशन के दौरान 10 एमएम की पथरी रह गई, जिससे पत्नी को लगातार दर्द होता रहा। बाद में दूसरे अस्पताल में पथरी निकाली गई। शिकायतकर्ता ने इसे चिकित्सकीय लापरवाही बताया।
शिकायत पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी, गौतमबुद्ध नगर ने 11 जुलाई 2025 को अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. शुभ्रा मित्तल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की। डॉ. राहुल वर्मा भी इसके सदस्य थे। समिति ने संबंधित पक्षों को सुनने और उपलब्ध दस्तावेजों व मेडिकल रिपोर्टों पर विचार करने के बाद अपनी रिपोर्ट दी। शिकायतकर्ता रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हुआ और उसने जिलाधिकारी के समक्ष फिर शिकायत की।
इसके बाद उसने बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देकर डॉ. राहुल वर्मा समेत अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम ने 12 अगस्त 2026 को पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। डॉ. राहुल वर्मा ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान प्रमुख दलीलें व फैसला
- अस्पताल व उपचार से कोई संबंध नहीं: याची के अधिवक्ता ने कहा कि याची जिला संयुक्त अस्पताल, नोएडा में कंसल्टेंट सर्जन है। सीएमओ के आदेश पर गठित समिति के सदस्य के रूप में केवल अपना आधिकारिक दायित्व निभा रहे थे। उनका शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या सर्जरी से कोई संबंध नहीं था।
- सुप्रीम कोर्ट की नजीर: अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के 'ओम प्रकाश अंबाडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य' के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उसके आधिकारिक कार्य से जुड़ी शिकायत पर जांच का आदेश देने से पहले उसका पक्ष सुनना अनिवार्य है।
- कानून की कसौटी पर खरा नहीं आदेश: हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने डॉ. राहुल वर्मा से कोई जवाब नहीं मांगा और उनका पक्ष सुने बिना ही एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया। कोर्ट ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 175(4)(बी) में दी गई सुरक्षा का पालन किया जाना जरूरी था, इसलिए मजिस्ट्रेट का आदेश कानून की कसौटी पर टिकाऊ नहीं है।
- लापरवाही का कोई प्रमाण नहीं: कोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि डॉ. राहुल वर्मा शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या सर्जरी में शामिल थे अथवा उन्होंने किसी प्रकार की चिकित्सकीय लापरवाही की थी।

