फर्जी नियुक्ति के आधार पर वेतन या सेवा लाभ का दावा नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति का आधार ही फर्जी दस्तावेज या फर्जी अनुमोदन आदेश है, तो वह सरकारी खजाने से वेतन या अन्य सेवा लाभ पाने का हकदार नहीं है । अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि लंबे समय तक कार्य करने मात्र से या पूर्व में जारी किसी
प्रशासनिक आदेश के बल पर किसी अवैध नियुक्ति को वैध कानूनी अधिकार नहीं माना जा सकता ।
प्रशासनिक आदेश के बल पर किसी अवैध नियुक्ति को वैध कानूनी अधिकार नहीं माना जा सकता
यह कड़ा निर्णय न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने संत कबीर नगर जिले के महात्मा गांधी कृषक पूर्व माध्यमिक विद्यालय, किनोना, कुरथिया में सहायक अध्यापक के रूप में कार्यरत शीतला प्रसाद द्वारा दाखिल की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया ।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता शीतला प्रसाद ने वर्ष 1977 में अपनी नियुक्ति होने का दावा करते हुए सरकारी खजाने से बकाया वेतन और अन्य सेवा लाभों के भुगतान की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी । हालांकि, जांच के दौरान यह पाया गया कि उनकी नियुक्ति को वर्ष 1982 में जो मंजूरी दी गई थी, वह एक फर्जी अनुमोदन आदेश पर आधारित थी ।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां:
- वैध नियुक्ति अनिवार्य: अदालत ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि सरकारी खजाने से वेतन प्राप्त करने के लिए यह अनिवार्य शर्त है कि संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति पूरी तरह से वैध हो और वह किसी स्वीकृत पद पर नियुक्त किया गया हो
। - फर्जी दस्तावेजों से अधिकार नहीं मिलता: न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि नियुक्ति की बुनियाद ही फर्जी दस्तावेजों पर टिकी हो, तो केवल वर्षों तक काम करते रहने या पूर्व के प्रशासनिक आदेशों के आधार पर वेतन पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता
।
इन तर्कों और तथ्यों के आधार पर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शीतला प्रसाद की याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है । इस फैसले से स्पष्ट संदेश गया है कि शिक्षा और सरकारी विभागों में फर्जी दस्तावेजों या अनुमोदनों के आधार पर लाभ लेने के प्रयासों को कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा।

