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19 September 2025

टीईटी अनिवार्यता और एनसीटीई की जवाबदेही पर उठे सवाल

 

देश में शिक्षा का अधिकार (RTE) लागू हुए 15 साल पूरे हो गए हैं। इस कानून के तहत बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन वर्तमान में इसका सबसे बड़ा बोझ शिक्षक वर्ग पर डाला जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश ने कक्षा एक से आठ तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) पास करना अनिवार्य कर दिया है, जिससे हजारों शिक्षक असमंजस में हैं।



विशेषज्ञों के अनुसार, सवाल यह नहीं कि टीईटी की जरूरत क्यों है, बल्कि यह है कि इतने वर्षों में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) और राज्यों ने शिक्षकों से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए उचित कदम क्यों नहीं उठाए।


एनसीटीई का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के न्यूनतम मानकों को तय करना था, लेकिन समय रहते न तो स्पष्ट नीतियां बनीं और न ही प्रभावी प्रशिक्षण व्यवस्था। कई शिक्षक जो केवल इंटरमीडिएट या अंक निर्धारित सीमा से कम प्राप्त करके स्नातक हैं, वे अब परीक्षा में असफल हो रहे हैं। इसके अलावा, बीटीसी जैसे आवश्यक प्रशिक्षण से वंचित मृतक आश्रित शिक्षक और डीपीएड, बीपीएड डिग्रीधारक भी पात्रता से बाहर हो गए हैं।


2010 में टीईटी अनिवार्य किए जाने के बाद भी इस कानून का भूतलक्षी प्रभाव लागू करने को व्यापक विवाद का विषय माना जा रहा है। 23 अगस्त 2010 की एनसीटीई अधिसूचना में स्पष्ट था कि उससे पहले नियुक्त शिक्षकों को नई योग्यता मानकों को पूरा नहीं करना होगा, लेकिन वर्तमान आदेश में इसी वर्ग से परीक्षा पास करने की मांग की गई है।


विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछले 15 वर्षों में न तो एनसीटीई और न ही सरकारों ने शिक्षक प्रशिक्षण और पात्रता पर उचित ध्यान दिया, जिसके कारण आज शिक्षक तनावग्रस्त हैं। इसे लेकर सरकार और नीतिनिर्माताओं की जवाबदेही बनती है।


शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा सुधार शिक्षक समुदाय को अपमानित करके संभव नहीं है। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व शिक्षक शक्ति दोनों को बनाए रखना है, तो तत्काल प्रभाव से पुराने शिक्षकों के लिए व्यवहारिक और सम्मानजनक समाधान पर जोर दिया जाना चाहिए। अन्यथा यह कानून न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करेगा, बल्कि लाखों शिक्षकों की रोजगार सुरक्षा पर भी संकट लाएगा।

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