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08 January 2026

“शिक्षक संख्या नहीं हैं: समायोजन के नाम पर संवैधानिक मूल्यों का हनन”

 

उत्तर प्रदेश की बेसिक शिक्षा में यदि पूरे वर्ष को किसी एक शब्द ने निगल लिया है, तो वह शब्द है— समायोजन। अब यह आशंका नहीं, बल्कि ठोस भय बन चुकी है कि आने वाला वर्ष भी उसी अव्यवस्था, उसी अनिश्चितता और उसी मानसिक उत्पीड़न का विस्तार होगा। यह महज़ एक प्रशासनिक कवायद नहीं है, बल्कि हजारों शिक्षकों के जीवन, उनके परिवार, बच्चों की पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा गम्भीर मानवीय प्रश्न बन चुका है।



सबसे आपत्तिजनक तथ्य यह है कि न कोई एक समान नियम है, न पारदर्शी प्रक्रिया और न ही कोई स्पष्ट विधिक आधार। हर जिला अपने हिसाब से नियम गढ़ रहा है, अपनी व्याख्या कर रहा है और अपनी मनमानी चला रहा है। कहीं वरिष्ठता देखी जा रही है, कहीं उसे कूड़ेदान में फेंक दिया गया है। कहीं रिक्तियों का वास्तविक आंकड़ा है, कहीं अनुमान और अफवाह। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि घर बैठे पीडीएफ बनाई जा रही हैं और व्हाट्सएप पर चिपका दी जा रही हैं, मानो यह कोई आदेश नहीं बल्कि किसी अनौपचारिक फरमान हो।


और इस पूरे तमाशे में सबसे चिंताजनक बात यह है कि शिक्षक संघों की मांगों, ज्ञापनों और चेतावनियों को पूरी तरह किनारे कर दिया गया है। महीनों से संघ लिखित ज्ञापन दे रहे हैं—एक समान नीति, पोर्टल आधारित समायोजन, आपत्ति का अवसर, सुनवाई की व्यवस्था, पारदर्शी सूची—लेकिन जिम्मेदारों का रवैया ऐसा है मानो शिक्षक संघ कोई हितधारक ही नहीं, बल्कि रास्ते की बाधा हों। संवाद की जगह मौन है, और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जगह आदेशात्मक अहंकार।


यह रवैया केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि प्रशासनिक गरिमा और संवैधानिक मूल्यों का सीधा अपमान है। समायोजन और स्थानांतरण जैसे संवेदनशील विषय को इस तरह अनौपचारिक, अपारदर्शी और गैर-जवाबदेह तरीके से लागू करना यह स्पष्ट करता है कि शिक्षक को अब एक पेशेवर नहीं, बल्कि एक संख्या, एक फाइल, एक बोझ समझ लिया गया है। न आपत्ति का अधिकार, न सुनवाई का मंच, न स्पष्ट आदेश, केवल एक संदेश– आदेश पकड़ो और पालन करो।


जब शिक्षकों और शिक्षक संघों की बात सुने बिना, ज़मीनी सच्चाई समझे बिना, और शासन के बनाए नियमों अधिनियमों को ताक पर रखकर निर्णय लिए जाएंगे, तो परिणाम केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी होंगे। यह प्रक्रिया शिक्षकों में असुरक्षा, अविश्वास और भय का स्थायी वातावरण बना रही है। यह भ्रम पालना खतरनाक है कि भयभीत शिक्षक बेहतर शिक्षा दे पाएगा। जो स्वयं अस्थिर है, वह बच्चों को स्थिरता कैसे देगा?


इस पूरी प्रक्रिया पर अब औपचारिक नहीं, बल्कि कठोर और सार्वजनिक आपत्ति दर्ज होनी चाहिए। यदि समायोजन अपरिहार्य है, तो वह केवल और केवल लिखित, स्पष्ट, एक समान नियमों, पोर्टल आधारित प्रणाली, आपत्ति और सुनवाई की विधिवत व्यवस्था तथा शिक्षक संघों की सहभागिता के साथ ही हो। साथ ही व्हाट्सएप पर भेजने की प्रक्रिया तत्काल बंद होनी चाहिए।


शिक्षा व्यवस्था कोई प्रयोगशाला नहीं है और शिक्षक कोई परीक्षण सामग्री नहीं। शिक्षकों और संगठनों की आवाज़ को दबाकर, नियमों को रौंदकर और मानवीय पक्ष को अनदेखा करके यदि आने वाला साल भी इसी अव्यवस्था की भेंट चढ़ा, तो इसका खामियाजा केवल शिक्षक नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी भुगतेगी—और तब इसकी जिम्मेदारी से कोई बच नहीं पाएगा।


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