प्रयागराज, । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालत के आदेशों की अवहेलना पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि न्यायालय के आदेश केवल ‘सजावटी कागज़’ नहीं हैं, बल्कि उनका पालन करना सभी पक्षों की बाध्यकारी जिम्मेदारी है। कोर्ट ने कहा कि यदि केवल स्टे वेकेशन आवेदन दाखिल कर देने से आदेशों का पालन रोका जाने लगे तो न्याय व्यवस्था अराजकता में बदल जाएगी।
शिक्षक राधेश्याम यादव की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट जैसे संवैधानिक न्यायालयों में एक जज के समक्ष प्रतिदिन 400, 500, 600 और कई बार 800 से अधिक मुकदमे सूचीबद्ध होते हैं। ऐसे अत्यधिक बोझ के बीच क्या लोग यह अपेक्षा कर सकते हैं कि न्यायाधीश ‘सुपर रोबोट, सुपर कंप्यूटर या सुपर ह्यूमन’ की तरह लगातार काम करें? अदालत ने कहा कि मामलों के लंबित रहने के दौरान यदि पक्षकारों को खुलेआम आदेशों की अवहेलना की छूट दे दी जाए तो न्याय व्यवस्था पूरी तरह अव्यवस्था और अराजकता में बदल जाएगी। याची के पक्ष में वर्ष 2022 में पारित अंतरिम आदेश के बावजूद चार वर्षों तक वेतन नहीं दिया गया। अदालत ने गाजीपुर के वर्तमान जिला विद्यालय निरीक्षक प्रकाश सिंह को पक्षकार बनाते हुए उनके खिलाफ आगे की अवमानना कार्यवाही शुरू करने के निर्देश दिए।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि रिट याचिका में स्टे वेकेशन आवेदन लंबित है, इसलिए आदेश का पालन नहीं किया गया। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल आवेदन दाखिल कर देना किसी अंतरिम आदेश को स्वतः निष्प्रभावी नहीं बनाता। जब तक सक्षम अदालत आदेश को संशोधित, स्थगित या निरस्त न करे, तब तक उसका पालन अनिवार्य है।

