इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज मृत्यु और क्रूरता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर फैसला देते हुए कहा है कि यदि किसी व्यक्ति ने पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी की है और वह विवाह संबंधित व्यक्तिगत कानून के अनुसार शून्य है, तो सामान्यतः उसे भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 (दहेज मृत्यु) और धारा 85 (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के लिए ‘पति’ की श्रेणी में नहीं माना जाएगा।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने यह फैसला पीलीभीत के माधोटांडा थाने में दर्ज दहेज मृत्यु और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के मामले में आरोपी सर्वेश उर्फ छोटू उर्फ छोटेलाल की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
अभियोजन के अनुसार, आरोपी की दूसरी पत्नी की सात वर्ष के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी। उसके खिलाफ बीएनएस की धारा 80, 85 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं 3/4 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। बचाव पक्ष के अधिवक्ता सुनील कुमार ने तर्क दिया कि मृतका आरोपी की दूसरी पत्नी थी और विवाह पहली पत्नी के जीवित रहते हुआ था चूंकि यह विवाह शून्य था, इसलिए आरोपी को कानून की दृष्टि में ‘पति’ नहीं माना जा सकता और उस पर धारा 80 व 85 लागू नहीं होती।

