08 August 2026

फर्जी नियुक्ति के नाम पर सरकारी धन के लूट की छूट नहीं दी जा सकती : हाईकोर्ट

 

फर्जी नियुक्ति के नाम पर सरकारी धन के लूट की छूट नहीं दी जा सकती : हाईकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बागपत के शास्त्री स्मारक इंटर कॉलेज में कथित रूप से फर्जी तरीके से हुई सहायक शिक्षक की नियुक्ति के मामले में सुभाष चंद्र त्यागी की विशेष अपील खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने वर्ष 2011 में एकल पीठ द्वारा पारित आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि अवैध नियुक्ति के आधार पर वर्षों तक राज्य कोष से वेतन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को किसी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने 2.16 लाख रुपये की लागत वसूली के आदेश को भी बरकरार रखा और अपील पर लगी अंतरिम रोक हटा दी।



मामला वर्ष 1992 में कथित अल्पकालिक रिक्ति पर हुई तदर्थ नियुक्ति से जुड़ा था। अपीलकर्ता का दावा था कि एक शिक्षक के दो वर्ष के अवैतनिक अवकाश पर जाने से रिक्ति उत्पन्न हुई थी, जिस पर उसकी नियुक्ति हुई। बाद में हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के आधार पर उसे वेतन मिलता रहा। हालांकि सुनवाई के दौरान अभिलेखों से पता चला कि जिस शिक्षक के अवकाश पर जाने का दावा किया गया था, उसका नाम वेतन अभिलेखों में कभी दर्ज ही नहीं था और उसके अवकाश से संबंधित कोई रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं था। जिस तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक ने नियुक्ति को स्वीकृति दी थी, उसके खिलाफ बाद में 96 फर्जी नियुक्तियों को संरक्षण देने के आरोप सिद्ध होने पर विभागीय कार्रवाई भी की गई थी।


खंडपीठ ने कहा कि यह मामला दर्शाता है कि किस प्रकार राज्य के खजाने की लूट की जाती है और कुछ असामाजिक तत्व अधिकारियों की मिलीभगत से वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग कर सरकारी धन का लाभ उठाते रहते हैं। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक रोजगार एक सार्वजनिक न्यास है और धोखाधड़ी या छल से प्राप्त नियुक्ति संविधान के समानता और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर सीधा आघात है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अंतरिम आदेश से कोई स्थायी अधिकार उत्पन्न नहीं होता। यदि अंततः याचिका खारिज हो जाती है तो उस अंतरिम आदेश के आधार पर प्राप्त सभी लाभ स्वतः समाप्त हो जाते हैं और ऐसे लाभ वापस लिए जा सकते हैं। अदालत ने कहा कि धोखाधड़ी और न्याय कभी साथ नहीं चल सकते तथा कोई भी व्यक्ति न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर राज्य के खजाने से अनुचित लाभ नहीं उठा सकता। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने विशेष अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि अपीलकर्ता की नियुक्ति शुरू से ही अवैध और धोखाधड़ीपूर्ण थी, इसलिए उसे किसी प्रकार की राहत देने का कोई औचित्य नहीं है।