प्रयागराज, विधि संवाददाता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी से राज्य सरकार ने लगभग तीन दशकों तक लगातार सेवा ली है, तो बाद में तकनीकी आधार या स्वीकृत पद न होने का हवाला देकर उसे सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सेवानिवृत्ति लाभ पाने का अधिकार सेवा की अवधि से जुड़ा होता है, न कि केवल पद से।
यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने बालकृष्ण शर्मा की विशेष अपील पर उसके अधिवक्ता विभु राय व सरकारी वकील को सुनकर अपील स्वीकार करते हुए दिया है। इसी के साथ खंडपीठ ने एकल पीठ के 31 अगस्त 2012 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें याची की सेवा समाप्ति को सही ठहराया गया था।
मामले के तथ्यों के अनुसार वर्ष 1997 में कनिष्ठ लिपिक के दो सामान्य पदों के लिए विज्ञापन निकाला गया था। लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद 31 जुलाई 1997 को जारी चयन सूची में बालकृष्ण शर्मा का नाम दूसरे स्थान पर आया। 12 सितंबर 1997 को उसे नियुक्ति पत्र जारी किया गया और उन्होंने पीलीभीत जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय में कार्यभार संभाला।
चयन प्रक्रिया पूरी होने के दौरान ही विज्ञापित दो पदों में से एक पर मृतक आश्रित कोटे से नियुक्ति कर दी गई, जबकि मेरिट में प्रथम आए अभ्यर्थी को दूसरे पद पर रखा गया। इसके बाद विभाग ने तर्क दिया कि अपीलार्थी की नियुक्ति केवल अवकाश रिक्ति के तहत थी और नियमित पद उपलब्ध न होने के कारण 13 सितंबर 2000 को उसकी सेवा समाप्त कर दी गई।
हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन रहने और अंतरिम आदेश के कारण याची 12 सितंबर 1997 से लेकर अगस्त 2026 तक लगातार विभाग में कार्यरत रहा।

