इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि केवल धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति का दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति अपनी जनजाति की रीति-रिवाजों, परंपराओं से पूरी तरह अलग हो जाता है और दूसरी सामाजिक व धार्मिक पहचान अपना लेता है, तो वह कानूनन मिलने वाले एसटी वर्ग के लाभों का दावा जारी नहीं रख सकता।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार ने नन्हकी की तीन याचिकाओं को खारिज करते हुए दिया है।
याची ने दुद्धी के डिप्टी कलेक्टर के बाद गत 22 जनवरी के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके तहत उसकी जमीनों के बैनामों को अवैध घोषित कर जमीनों को राज्य सरकार में निहित करने का निर्देश दिया गया था। याची ने दावा करते हुए दुद्धी तहसील से एसटी का प्रमाण पत्र प्राप्त किया था। 2011 से 2018 के दौरान गोंड अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों से कृषि भूमि खरीदी थी। जांच में सामने आया कि याची ने कई दशक पहले सिराजुद्दीन से इस्लामिक रीति-रिवाज के अनुसार निकाह किया था।

