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20 September 2026

शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन न देना देश में ज्ञान के महत्व को घटाता है: सुप्रीम कोर्ट

 

शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन न देना देश में ज्ञान के महत्व को घटाता है: सुप्रीम कोर्ट

समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, शिक्षाविदों को बताया राष्ट्र की बौद्धिक रीढ़

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों के वेतन और उनके सम्मान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि शिक्षकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं करना और उन्हें उचित वेतन नहीं देना देश में ज्ञान के महत्व को कम करता है। शिक्षाविद, लेक्चरर और प्रोफेसर आने वाली पीढ़ियों के व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि शिक्षकों को उचित वेतन और सम्मानजनक व्यवहार मिलना जरूरी है। कोर्ट के अनुसार शिक्षकों की भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नवाचार और युवाओं के बेहतर भविष्य के निर्माण में योगदान देते हैं।

समान कार्य के लिए समान वेतन पर जोर

मामले में पीठ ने समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत पर भी विचार किया। रिपोर्ट के अनुसार मामला गुजरात में संविदा पर नियुक्त सहायक प्रोफेसरों के वेतन से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के दो फैसलों के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि समानता के उचित दावे को केवल तकनीकी आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। पीठ ने संविदा पर नियुक्त कुछ सहायक प्रोफेसरों के लिए न्यूनतम वेतनमान के बराबर भुगतान किए जाने के निर्देश से जुड़े मामले पर विचार किया।

शिक्षकों को बताया देश की बौद्धिक रीढ़

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षाविदों, लेक्चररों और प्रोफेसरों को देश की बौद्धिक रीढ़ बताते हुए कहा कि वे आने वाली पीढ़ियों के मन और चरित्र को आकार देने में अपना जीवन समर्पित करते हैं।

कोर्ट की टिप्पणी में यह भी कहा गया कि उचित वेतन और सम्मानजनक व्यवहार के माध्यम से शिक्षकों की भूमिका के महत्व को मजबूत किया जा सकता है। पीठ ने शिक्षण क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के योगदान और उनके साथ उचित व्यवहार की आवश्यकता पर जोर दिया।

संविदा शिक्षकों के वेतन का मुद्दा

मामले में यह मुद्दा भी सामने आया कि संविदा पर कार्यरत सहायक प्रोफेसरों को नियमित पदों पर कार्यरत कर्मचारियों की तुलना में काफी कम वेतन दिया जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में स्वीकृत 2,720 पदों में से केवल 923 पद नियमित थे।

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षण गतिविधियों की निरंतरता बनाए रखने और इस अंतर को दूर करने के लिए राज्य सरकार द्वारा तदर्थ एवं संविदा नियुक्तियों का सहारा लिए जाने के संदर्भ में भी मामले पर विचार किया।

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