मेधावी अभ्यर्थियों का श्रेणीवार ब्योरा मांगा
प्रयागराज, विधि संवाददाता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग से उत्तर प्रदेश सम्मिलित राज्य/प्रवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा (पीसीएस)-2025 की भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण और मेरिट के आधार पर अभ्यर्थियों के समायोजन से जुड़े विवाद में प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा में आरक्षित और अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के अंकों व उनके श्रेणीवार समायोजन का ब्योरा मांगा है। पीसीएस-2025 के साक्षात्कार संपन्न होने के बावजूद अंतिम परिणाम पर पूर्व में लगाई गई रोक जारी है। यह आदेश न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने संजय कुमार एवं तीन अन्य की याचिका पर याचियों की ओर से अधिवक्ता अभिषेक शुक्ल व दुर्गा शंकर शुक्ल और राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अधिवक्ता मनीष गोयल को सुनकर दिया। कोर्ट ने सरकार को हलफनामा दाखिल करने को दो सप्ताह का समय दिया। साथ ही आयोग की ओर से उपस्थित अधिवक्ता अवनीश त्रिपाठी को पूरक जवाबी हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी।
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कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया कि प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा, दोनों चरणों में आरक्षित वर्ग के ऐसे अभ्यर्थियों की संख्या बताए, जिन्होंने अनारक्षित श्रेणी के अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक प्राप्त किए हैं।इसके अलावा आयोग को यह भी स्पष्ट करना होगा कि अनारक्षित वर्ग के ऐसे अभ्यर्थी, जिन्होंने प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक प्राप्त किए, उन्हें किस श्रेणी में रखा गया है। कोर्ट ने पूछा है कि इन अभ्यर्थियों का समायोजन अनारक्षित श्रेणी में किया गया या उनकी संबंधित श्रेणी में।
याचियों के अधिवक्ता अभिषेक शुक्ल ने बताया कि विवाद का केंद्र उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का 9 जनवरी 2020 का कार्यालय ज्ञापन और पीसीएस-2025 के भर्ती विज्ञापन की संबंधित शर्तें हैं। याचिका में इन प्रावधानों की वैधानिकता को चुनौती देते हुए कहा गया है कि खुली प्रतियोगिता में मेरिट के आधार पर स्थान प्राप्त करने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को केवल उनकी सामाजिक श्रेणी के आधार पर अनारक्षित सीटों की प्रतिस्पर्धा से बाहर नहीं किया जा सकता। उनका तर्क है कि अनारक्षित श्रेणी किसी विशेष सामाजिक वर्ग के लिए निर्धारित कोटा नहीं बल्कि सभी पात्र अभ्यर्थियों के लिए खुली प्रतियोगिता का क्षेत्र है। आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी बिना निर्धारित योग्यता मानकों में छूट लिए अनारक्षित श्रेणी की मेरिट प्राप्त करता है तो उसे उस श्रेणी में प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलना चाहिए। याचिका में उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों व अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) अधिनियम 1994 की धारा 3(6) और आयोग के कार्यालय ज्ञापन के बीच कथित असंगति का मुद्दा भी उठाया गया है। अधिवक्ता के अनुसार आयोग की प्रशासनिक व्यवस्था किसी वैधानिक प्रावधान के विपरीत अभ्यर्थियों के अधिकारों को सीमित नहीं कर सकती।अधिवक्ता अभिषेक शुक्ल ने कहा कि यह विवाद केवल आरक्षण के प्रतिशत का नहीं, बल्कि खुली प्रतियोगिता में समान अवसर और मेरिट के आधार पर निष्पक्ष चयन का है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 के अंतर्गत समानता तथा सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता के संवैधानिक सिद्धांतों का प्रश्न उठाया गया है।
गौरतलब है कि इस मामले में कोर्ट ने गत 28 सितंबर को सुनवाई के बाद निर्णय सुरक्षित कर लिया था। इससे पहले आयोग को पीसीएस-2025 के साक्षात्कार आयोजित करने की अनुमति दी गई थी, लेकिन अंतिम परिणाम प्रकाशित नहीं करने का निर्देश भी दिया गया था।आयोग की ओर से साक्षात्कार प्रक्रिया 24 अक्टूबर को पूरी की जा चुकी है। हालांकि, कोर्ट के पूर्व निर्देश के क्रम में अंतिम परिणाम जारी नहीं हुआ है।
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