03 August 2026

सरकारी शिक्षक कर रहे प्राइवेट कोचिंग? RTE की धारा 28 में है रोक, जानिए क्या कहता है कानून

 

सरकारी शिक्षक और प्राइवेट कोचिंग का खेल: RTE की धारा 28 के बावजूद निजी ट्यूशन पर क्यों नहीं लग रही रोक?

शिक्षा डेस्क | 3 अगस्त 2026

सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों द्वारा निजी ट्यूशन या कोचिंग में पढ़ाने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 की धारा 28 शिक्षकों के निजी ट्यूशन और निजी शिक्षण गतिविधियों में शामिल होने पर रोक लगाती है। इसके बावजूद अलग-अलग राज्यों से समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं, जिनमें सरकारी शिक्षकों के निजी कोचिंग से जुड़े होने के आरोप लगाए जाते हैं।

सवाल यह है कि जब कानून में निजी ट्यूशन को लेकर स्पष्ट प्रावधान मौजूद है, तो जमीनी स्तर पर इसका पालन कितना प्रभावी ढंग से हो रहा है?

RTE की धारा 28 में क्या है प्रावधान?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 28 में कहा गया है—

“No teacher shall engage himself or herself in private tuition or private teaching activity.”

अर्थात संबंधित दायरे में आने वाला कोई शिक्षक निजी ट्यूशन या निजी शिक्षण गतिविधि में स्वयं को संलग्न नहीं करेगा।

इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शिक्षक अपनी जिम्मेदारी और समय का उपयोग विद्यार्थियों की स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने में करें और ऐसी स्थिति पैदा न हो जिसमें विद्यार्थियों को उसी शिक्षा के लिए अलग से निजी ट्यूशन लेने की आवश्यकता पड़े।

प्राइवेट ट्यूशन पर फिर क्यों उठ रहे सवाल?

देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकारी शिक्षकों के निजी ट्यूशन और कोचिंग से जुड़े होने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी इस विषय को लेकर प्रशासनिक स्तर पर निर्देश और कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं।

ऐसे मामलों ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—यदि कोई शिक्षक सरकारी या सहायता प्राप्त विद्यालय में सेवा दे रहा है और उसके सेवा नियम निजी ट्यूशन की अनुमति नहीं देते, तो क्या वह स्कूल के बाद किसी निजी कोचिंग संस्थान में फीस लेकर पढ़ा सकता है?

इसका उत्तर संबंधित कानून, शिक्षक की नियुक्ति की प्रकृति और लागू सेवा नियमों के आधार पर तय होता है।

सबसे ज्यादा असर गरीब विद्यार्थियों पर

निजी ट्यूशन से जुड़ा मुद्दा केवल शिक्षक के अतिरिक्त आय अर्जित करने तक सीमित नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की शिक्षा है।

सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बहुत से परिवार निजी कोचिंग का अतिरिक्त खर्च नहीं उठा सकते। ऐसे विद्यार्थियों के लिए विद्यालय ही शिक्षा का मुख्य माध्यम है।

यदि किसी विद्यालय में नियमित शिक्षण कमजोर होता है और विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम समझने के लिए बाहर निजी ट्यूशन पर निर्भर होना पड़ता है, तो आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे दूसरे विद्यार्थियों की तुलना में पीछे छूट सकते हैं।

यही कारण है कि निजी ट्यूशन पर रोक को शिक्षा में समान अवसर से भी जोड़कर देखा जाता है।

स्कूल में पढ़ाई कमजोर और बाहर कोचिंग मजबूत?

अभिभावकों के बीच अक्सर यह सवाल उठता है कि जब बच्चा रोज स्कूल जा रहा है तो उसे उसी विषय को समझने के लिए अलग से कोचिंग क्यों लेनी पड़ रही है?

हालांकि प्रत्येक मामले में इसके लिए शिक्षक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। विद्यार्थियों की व्यक्तिगत जरूरत, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और अतिरिक्त अभ्यास जैसे कई कारणों से भी कोचिंग ली जाती है।

लेकिन यदि कोई शिक्षक जानबूझकर विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण नहीं करता और बाद में उन्हीं या दूसरे विद्यार्थियों को पैसे लेकर निजी रूप से पढ़ाता है, तो यह गंभीर नैतिक और प्रशासनिक सवाल पैदा करता है।

शिकायत मिलने पर क्या हो सकती है कार्रवाई?

किसी सरकारी शिक्षक के निजी ट्यूशन या प्रतिबंधित निजी शिक्षण गतिविधि में शामिल होने की शिकायत मिलने पर संबंधित शिक्षा विभाग मामले की जांच करा सकता है।

सबूत और लागू सेवा नियमों के आधार पर शिक्षक से स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है, विभागीय जांच शुरू हो सकती है और आरोप प्रमाणित होने की स्थिति में अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है। कार्रवाई की प्रकृति संबंधित राज्य के सेवा नियमों और मामले की गंभीरता पर निर्भर करेगी।

इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि हर मामले में सीधे निलंबन या सेवा समाप्ति ही होगी। पहले शिकायत, साक्ष्य, जांच और संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर देने जैसी विभागीय प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है।

शिक्षा विभाग की जवाबदेही भी जरूरी

मामला केवल शिक्षकों की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है। यदि किसी जिले में निजी ट्यूशन या कोचिंग को लेकर बार-बार शिकायतें मिलती हैं तो शिक्षा विभाग और संबंधित अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण, निष्पक्ष जांच और दोषी पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई व्यवस्था में भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है।

साथ ही केवल शिकायत के आधार पर किसी शिक्षक को दोषी घोषित करना भी उचित नहीं है। सोशल मीडिया पोस्ट, फोटो या वीडियो की सत्यता की जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए।

अभिभावक शिकायत कैसे कर सकते हैं?

यदि किसी अभिभावक या नागरिक के पास किसी शिक्षक द्वारा नियमों के विरुद्ध निजी ट्यूशन या कोचिंग चलाने के ठोस प्रमाण हैं, तो वह संबंधित प्रधानाचार्य, खंड शिक्षा अधिकारी, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी या सक्षम शिक्षा अधिकारी के समक्ष लिखित शिकायत कर सकता है।

शिकायत में तारीख, स्थान, कोचिंग संस्थान का विवरण और उपलब्ध साक्ष्य दिए जाने से जांच में मदद मिल सकती है। शिकायतकर्ता को बिना सत्यापन के किसी शिक्षक का नाम या फोटो सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने से बचना चाहिए, क्योंकि गलत आरोप संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

केवल प्रतिबंध नहीं, सरकारी स्कूलों की पढ़ाई मजबूत करना भी जरूरी

निजी ट्यूशन पर कार्रवाई इस समस्या का केवल एक हिस्सा है। इसका स्थायी समाधान सरकारी विद्यालयों में ऐसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है जिससे सामान्य पाठ्यक्रम को समझने के लिए बच्चों को अनिवार्य रूप से बाहरी कोचिंग पर निर्भर न रहना पड़े।

इसके लिए शिक्षकों की जवाबदेही के साथ पर्याप्त शिक्षक संख्या, बेहतर प्रशिक्षण, नियमित शैक्षणिक सहयोग, विद्यार्थियों की सीखने की प्रगति का मूल्यांकन और कमजोर बच्चों के लिए स्कूल में ही अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था जरूरी है।

बड़ा सवाल—कानून मौजूद है, पालन कितना?

RTE की धारा 28 निजी ट्यूशन को लेकर स्पष्ट संदेश देती है। इसके बावजूद यदि प्रतिबंधित श्रेणी में आने वाले शिक्षक निजी कोचिंग या ट्यूशन गतिविधियों से जुड़े पाए जाते हैं, तो कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और विभागीय निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई से संभव नहीं होगा। इसके लिए शिक्षक, अभिभावक, विद्यालय प्रशासन और शिक्षा विभाग—सभी की जवाबदेही तय करनी होगी।

अंततः सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे को ऐसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलनी चाहिए कि आर्थिक स्थिति उसके सीखने के अवसरों में बाधा न बने।

कानून कागज पर मौजूद होना पर्याप्त नहीं है; उसका निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन ही उसकी वास्तविक उपयोगिता तय करता है।