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26 October 2026

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तदर्थ कर्मचारी की सेवा समाप्ति पर बड़ा फैसला, जानें कोर्ट की टिप्पणी

 

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तदर्थ कर्मचारी की सामान्य सेवा समाप्ति के लिए विभागीय जांच और सुनवाई जरूरी नहीं

Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तदर्थ और अस्थायी कर्मचारियों की सेवा समाप्ति से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी तदर्थ या अस्थायी कर्मचारी की सेवा समाप्ति दंडात्मक प्रकृति की नहीं है, तो सामान्य परिस्थितियों में इसके लिए विभागीय जांच और सुनवाई का अवसर देना आवश्यक नहीं है। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने इटावा के राजकीय मूक-बधिर बालिका विद्यालय में कनिष्ठ लिपिक की सेवा समाप्ति के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।


क्या है पूरा मामला?

समाचार रिपोर्ट के अनुसार, रवींद्र पाल सिंह को 8 मई 1991 को इटावा के राजकीय मूक-बधिर बालिका विद्यालय में कनिष्ठ लिपिक के पद पर अस्थायी आधार पर नियुक्त किया गया था। नियुक्ति पत्र में स्पष्ट था कि उनकी सेवाएं अस्थायी प्रकृति की होंगी।

इसके बाद 29 सितंबर 1995 को एक महीने का नोटिस देकर उनकी सेवा समाप्त कर दी गई। कर्मचारी ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

कर्मचारी ने हाईकोर्ट में क्या दलील दी?

याचिका में सेवा समाप्ति के आदेश को चुनौती देते हुए कहा गया कि सेवा समाप्त करने से पहले उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में संविधान के अनुच्छेद 311(2) के उल्लंघन का मुद्दा भी उठाया गया।

राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि नियुक्ति नियमित चयन के बजाय अस्थायी व्यवस्था के तहत हुई थी। इसलिए लागू नियमों के अंतर्गत उनकी सेवा समाप्त की जा सकती थी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि तदर्थ या अस्थायी कर्मचारी की सेवा समाप्ति यदि दंडात्मक प्रकृति की नहीं है, तो उसके लिए विभागीय जांच और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य नहीं होता।

अदालत ने संबंधित नियुक्ति पत्र, सेवा की अस्थायी प्रकृति और लागू नियमों पर विचार किया। इसके बाद सेवा समाप्ति के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।

1975 की नियमावली का भी हुआ उल्लेख

समाचार रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश अस्थायी सरकारी सेवक (सेवा समाप्ति) नियमावली, 1975 का उल्लेख किया गया है। राज्य सरकार का पक्ष था कि संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति अस्थायी थी और लागू नियमों के तहत उनकी सेवाएं समाप्त की गई थीं।

हालांकि, ऐसे मामलों में सेवा समाप्ति का वास्तविक आधार, नियुक्ति की शर्तें और लागू सेवा नियम महत्वपूर्ण होते हैं। यदि आदेश वास्तव में दंडात्मक है या उसके पीछे कोई अन्य कानूनी समस्या है, तो स्थिति अलग हो सकती है।

क्या हर अस्थायी कर्मचारी पर लागू होगा यह फैसला?

इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी अस्थायी कर्मचारी को बिना किसी नियम का पालन किए सेवा से हटाया जा सकता है। सेवा समाप्ति की वैधता संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति की प्रकृति, लागू कानून, आदेश के कारण और मामले के तथ्यों पर निर्भर करती है।

इसलिए कर्मचारियों को किसी भी सेवा समाप्ति आदेश के मामले में संबंधित दस्तावेजों की जांच कराकर कानूनी सलाह लेनी चाहिए।


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अस्थायी कनिष्ठ लिपिक की सेवा समाप्ति से जुड़े मामले में राहत देने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। कोर्ट की टिप्पणी अस्थायी नियुक्तियों और गैर-दंडात्मक सेवा समाप्ति के कानूनी पहलुओं को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।