काश! हाथों में मोबाइल की जगह लौट आएं किताबें
आगामी 10 जनवरी से दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला शुरू हो रहा है। इससे पहले देश के कई शहरों में भीड़ भरे पुस्तक मेलों के सफल आयोजन हो चुके हैं, जिनमें किताबों की बेशुमार बिक्री दर्ज की गई है। यह प्रवृत्ति दुनियाभर में देखी जा रही है। अनायास नहीं है कि स्वीडन ने अपने यहां स्कूलों में लगाए उन सारे कंप्यूटर को हटा दिया है, जो डिजिटल लर्निंग को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2009 में लगाए गए थे। वहां एक बार फिर छपी हुई किताबें रखी जा रही हैं। यही नहीं, स्वीडन की सरकार ने स्कूलों में परंपरागत शिक्षण पद्धतियों को वापस लाने के लिए बहुत बड़ा बजट निर्धारित किया है।
ऐसा ही कुछ पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में भी हुआ, जहां की सरकार ने 16 साल से छोटे बच्चों का सोशल मीडिया उपयोग प्रतिबंधित कर दिया। नार्वे और ब्रिटेन किताबों से जुड़ी तरह-तरह की सर्जनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों को आर्थिक मदद दे रहे हैं। अमेरिकी भारतीयों ने अपनी भाषा की पुस्तकों के पाठ के लिए घर-घर ‘रीडिंग सेशन’ संचालित करना शुरू किया है, जो बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि यूनिसेफ ने 2022 में ही इस बात की चेतावनी दे दी थी कि किशोरों में बढ़ रहे सोशल मीडिया उपयोग से उनकी सामाजिक -सांस्कृतिक सरोकार की दुनिया संकुचित होती जा रही है। बच्चों को यदि उनका बचपन लौटाना है, तो उन्हें किताबें लौटानी होगी।
बहरहाल अपने देश में कई जगह किताबों की घर वापसी के लिए कमाल का काम हो रहा है। तकनीक और किताबें- दोनों के साथ नातेदारी बनाने की पहल भोपाल में हुई है, जहां नगर निगम के छह पुस्तकालयों में रोज सैकड़ों युवा विद्यार्थी पहुंच रहे हैं और अपनी उपस्थिति से वे किताबों की मेज पर वापस आने के ख्वाब पाल रहे हैं। केरल में किताबों को लेकर एक अनोखी पहल हुई है। यहां के पतनमथिट्टा जिले के आयुर्वेदिक अस्पताल ने मरीजों के इलाज में ‘पढ़ाई’ को शामिल किया है। रोचक है कि मरीजों को किताबें औषधीय पेड़-पौधों के बीच पढ़नी होती हैं। भरपूर ऑक्सीजन की उपलब्धता और मानसिक शांति का भाव इस पहल के केंद्र में हैं। ‘पुस्तक कुट्टू’ (किताबों से दोस्ती) नामक इस पहल को शुरू करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि इससे मरीजों में सार्थक सुधार देखने को मिल रहे हैं। जिस ओपीडी पर्ची पर दवाई मिलती है, उसी पर्ची पर किताबें भी मिल जाती हैं। इस पहल का ही परिणाम है कि कई जिलों में आशा कार्यकर्ता घर पर इलाज करा रहे लोगों तक किताबें पहुंचा-ले जा रही हैं।
‘यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स’ द्वारा हाल में किए एक अध्ययन के अनुसार, मात्र 6 मिनट तक किताब पढ़ने से 68 प्रतिशत तनाव कम हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किताबें पढ़ने से मन-मस्तिष्क किसी काल्पनिक दुनिया में चला जाता है, जिससे किताब पढ़ने वाले का ध्यान तरह-तरह की उलझनों से हट जाता है और उसके रक्तचाप में कमी आती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि नियमित रूप से किताब पढ़ने पर न केवल मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है, बल्कि मृत्यु का जोखिम 20 प्रतिशत तक कम हो जाता है। देखें तो 21वीं सदी के 25 साल गुजर जाने के बाद स्क्रीन से ऊबी दुनिया अपने लिए ऑफलाइन स्पेस की होड़ में शामिल हो चुकी है। लोगों का किस्सागोई या ऑडियो पॉडकास्ट की ओर मुड़ना इसी का नतीजा है। जगह-जगह मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के लिए कला-साहित्य उत्सव हो रहे हैं।
दुनिया में बढ़ते वर्चुअल ऑटिज्म के खतरे से निपटने में कारगर किताबों से दोस्ती निभाने में भारत बहुतेरे देशों से आगे है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब किताब छापने वाले देशों की सूची में 10वें स्थान पर आ गया है। सबसे ऊपर ब्रिटेन है, जहां लगभग 1,88,000 कितामें प्रतिवर्ष छपती हैं। भारत में अभी हर साल 24 से अधिक भाषाओं में लगभग 90,000 किताबें प्रकाशित हो रही हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत छपे हुए शब्दों की दुनिया में तेजी से आ रहा है। छोटे-बड़े शहरों में निरंतर आयोजित होने वाले पुस्तक मेलों में उमड़ने वाली भीड़ भी इस बात की तस्दीक करती है कि हम मजबूती के साथ किताबों की दुनिया में लौट रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) धनजय चोपड़ा
