सर्विस बुक में बेटे के रूप में दर्ज व्यक्ति की अनुकंपा नियुक्ति सही, हाईकोर्ट ने दिया आदेश
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि दिवंगत सरकारी कर्मचारी की सर्विस बुक और अन्य सरकारी अभिलेखों में बेटे के रूप में दर्ज व्यक्ति की अनुकंपा नियुक्ति को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह जैविक पुत्र नहीं है।
मामला जौनपुर के मोहम्मद अली से जुड़ा है। अली के पिता रेलवे विभाग में सफाईकर्मी थे और वर्ष 2014 में सेवा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी। परिवार में पत्नी, तीन विवाहित बेटियां और एक नाबालिग बेटा था।
दस्तावेजों में बेटे के रूप में दर्ज था
याची की मां ने बालिग होने के बाद बेटे के लिए अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। विभाग ने अक्टूबर 2018 में आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
याची की ओर से बताया गया कि विभागीय रिकॉर्ड में उसे दिवंगत कर्मचारी का बेटा दर्ज किया गया था। जन्म प्रमाणपत्र, परिवार रजिस्टर, आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड आदि दस्तावेजों में भी उसे अनवर अली का बेटा दर्ज किया गया था।
जैविक पुत्र होने का प्रमाण न होने पर भी नियुक्ति से इनकार नहीं
अदालत ने कहा कि यदि सरकारी अभिलेखों में व्यक्ति को कर्मचारी के बेटे के रूप में दर्ज किया गया है, तो केवल इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता कि उसके जैविक पुत्र होने का प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
न्यायमूर्ति अरुण मंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने जौनपुर निवासी मोहम्मद अली की याचिका स्वीकार करते हुए विभाग को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने दिया महत्वपूर्ण निर्देश
अदालत ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि याची के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर दो महीने के भीतर पुनर्विचार किया जाए और कानून के अनुसार उचित निर्णय लिया जाए।
इस फैसले से उन मामलों में राहत की उम्मीद बढ़ी है, जहां सरकारी सेवा अभिलेखों में किसी व्यक्ति को कर्मचारी के आश्रित या बेटे के रूप में दर्ज किया गया है, लेकिन बाद में उसकी जैविक संतान होने को लेकर सवाल उठाए जाते हैं।
पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी पर भी हाईकोर्ट की टिप्पणी
इसी सुनवाई में हाईकोर्ट ने पहली पत्नी के जीवित रहते विभागीय अनुमति के बिना दूसरी शादी करने के मामले में भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने इसे सीआरपीएफ नियमों का उल्लंघन और गंभीर कदाचार माना तथा बर्खास्त किए गए कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी।

