भाषा भी भेदभाव की वजह, हिंदी माध्यम के छात्रों को आंकते हैं कमतर: नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट
नई दिल्ली: उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के बीच भेदभाव को लेकर नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भाषा भी छात्रों के साथ भेदभाव की एक वजह बन रही है। अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर आने वाले कुछ विद्यार्थी क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़े साथियों को कमतर आंकते हैं।
रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक समेत विभिन्न राज्यों के संस्थानों में हुए अध्ययन का उल्लेख किया गया है। इसमें तनाव की बड़ी वजहों में सामाजिक अलगाव और भाषा संबंधी भेदभाव को भी शामिल किया गया है।
2.43 लाख विद्यार्थियों पर हुआ सर्वे
नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 2.43 लाख विद्यार्थियों पर सर्वे किया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि कई विद्यार्थी संस्थान में खुद को बाहरी महसूस करते हैं।
34% विद्यार्थियों ने परिसर में खुद को बाहरी महसूस किया।
56% विद्यार्थियों ने संस्थान के प्रशासन पर भरोसा न होने की बात कही।
रिपोर्ट में जातिगत भेदभाव को भी बड़ी चुनौती बताया गया है।
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों ने संस्थानों में खुद को कमतर आंके जाने की बात बताई।
अंग्रेजी माध्यम के छात्रों से जुड़ी भाषा की समस्या
रिपोर्ट के मुताबिक महानगरीय क्षेत्रों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर आने वाले विद्यार्थियों और हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से पढ़कर आए छात्रों के बीच भाषा को लेकर दूरी देखने को मिली।
नेशनल टास्क फोर्स के अनुसार, भाषा संबंधी भेदभाव कक्षा से लेकर छात्रावास तक दिखाई दे सकता है। कुछ छात्रों को अंग्रेजी बोलने वाले विद्यार्थियों के सामने असहजता महसूस होती है।
इसका असर विद्यार्थियों के आत्मविश्वास पर भी पड़ सकता है और वे परिसर में खुद को अलग-थलग महसूस कर सकते हैं।
32% छात्रों को नहीं मिली परामर्श की सुविधा
रिपोर्ट में छात्रों की मानसिक और भावनात्मक स्थिति से जुड़े आंकड़े भी दिए गए हैं। इसके अनुसार 32% विद्यार्थियों ने बताया कि संस्थान में उन्हें परामर्श (Counselling) की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
वहीं, रिपोर्ट में बताया गया कि 26% छात्रों को ऐसी सुविधा के बारे में पता ही नहीं था। लगभग 9% विद्यार्थियों ने बार-बार आत्महत्या के विचार आने की बात भी बताई।
रिपोर्ट में ऐसे मामलों से निपटने के लिए संस्थानों में बेहतर counselling और support system की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
18 साल से कम उम्र में लड़कियों की संख्या अधिक
रिपोर्ट में दिए आंकड़ों के अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु के समूह में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक दर्ज की गई।
वहीं 18 से 30 वर्ष की आयु वाले समूह में 3,774 छात्र और 2,347 छात्राएं दर्ज की गईं।
रिपोर्ट में 2022 के एनसीआरबी आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार पूरी आबादी के आंकड़ों में 18 वर्ष से कम उम्र के 10,204 मामलों में 55% लड़कियां थीं।
शिक्षा के आधार पर भी अंतर
रिपोर्ट में शिक्षा के आधार पर आत्महत्या से जुड़े आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। दिए गए आंकड़ों के अनुसार—
| शिक्षा स्तर | हिस्सेदारी |
|---|---|
| 10वीं | 23.9% |
| 8वीं | 18% |
| 12वीं | 15.9% |
| अशिक्षित | 14.5% |
| उच्च शिक्षित | 7.2% |
| स्नातक | 11.5% |
रिपोर्ट के अनुसार, भाषा, सामाजिक पृष्ठभूमि और परिसर में अलगाव जैसी स्थितियां विद्यार्थियों के अनुभव और मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।
संस्थानों में बेहतर माहौल की जरूरत
नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्ष उच्च शिक्षण संस्थानों में समावेशी और भेदभाव-मुक्त वातावरण की जरूरत को रेखांकित करते हैं। खासतौर पर भाषा और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर विद्यार्थियों के साथ अलग व्यवहार न हो, इसके लिए संस्थानों में संवेदनशीलता बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट में विद्यार्थियों के लिए counselling और support व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी ध्यान दिया गया है।

