*प्रभारी प्रधानाध्यापक प्रधानाध्यापिका का ऑर्डर अपलोड हो गया है...*
इस आदेश का सरल और महत्वपूर्ण सारांश यह है:
📌 आदेश का मुख्य विषय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में Writ-A No. 9410 of 2026 तथा उससे सम्बद्ध अन्य याचिकाओं में ऐसे सहायक अध्यापकों के वेतन का मुद्दा था, जो लंबे समय से कार्यवाहक/Officiating Headmaster के रूप में कार्य कर रहे हैं।
⚖️ न्यायालय ने क्या माना?
न्यायालय ने पूर्व के Tripurari Dubey मामले में दिए गए निर्णय और बाद में आए सुप्रीम कोर्ट के Maya Banerjee निर्णय पर विचार किया।
पहले Division Bench ने कहा था कि कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के रूप में किए गए कार्य का प्रधानाध्यापक के बराबर वेतन तो मिलेगा, लेकिन बकाया वेतन सामान्यतः रिट दाखिल करने से पूर्व केवल 3 वर्ष तक सीमित रहेगा।
लेकिन वर्तमान आदेश में न्यायालय ने माना कि इस 3 वर्ष की सीमा का आधार जिस Tarsem Singh निर्णय पर था, उस निर्णय को बाद के Maya Banerjee फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार करते हुए per incuriam माना, क्योंकि पहले के S.K. Mastan Bee निर्णय पर पर्याप्त विचार नहीं हुआ था।
💰 सबसे महत्वपूर्ण लाभ
न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया कि:
> सभी याचिकाकर्ताओं को उस तारीख से प्रधानाध्यापक के वेतन के बराबर वेतन मिलेगा, जिस तारीख से उन्होंने कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य करना शुरू किया था, और वास्तविक भुगतान तक यह देय रहेगा।
अर्थात 3 वर्ष की पिछली सीमा हटा दी गई है।
📋 अन्य निर्देश
Tripurari Dubey मामले में Division Bench द्वारा दिए गए बाकी सभी निर्देश यथावत लागू रहेंगे। केवल रिट दाखिल करने से पूर्व 3 वर्ष तक बकाया वेतन सीमित करने वाली व्यवस्था को हटाया गया है।
यदि कोई सहायक अध्यापक वास्तव में कार्यवाहक/Officiating Headmaster के रूप में कार्य करता रहा है, तो इस आदेश के अनुसार उसके प्रधानाध्यापक पद के वेतन का दावा केवल रिट दाखिल करने से पहले के 3 वर्षों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जिस दिन से उसने कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य प्रारम्भ किया, उस दिन से वास्तविक भुगतान तक वेतन का अंतर देय हो सकता है—बशर्ते संबंधित तथ्य और पात्रता सिद्ध हों।
आदेश दिनांक: 18 सितंबर 2026
न्यायमूर्ति: पंकज भाटिया
न्यायालय संख्या: 6
