प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी के अलग-अलग शैक्षणिक रिकॉर्ड में जन्मतिथि में सिर्फ़ मामूली अंतर होना जिसमें धोखाधड़ी, गलतबयानी या जानबूझकर कुछ छिपाने का कोई तत्व न हो तो उसे ‘धोखाधड़ी या जानबूझकर की गई गलतबयानी’ नहीं माना जाएगा, जिससे उसकी नियुक्ति रद्द की जा सके। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने इस तरह जून 2019 में मऊ में एक सरकारी सहायक अध्यापक विजय कुमार यादव के खिलाफ जारी बर्खास्तगी का आदेश रद्द किया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उसे तुरंत अपनी ड्यूटी फिर से शुरू करने की अनुमति दें।
कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी का निष्कर्ष, जिसके गंभीर सिविल परिणाम होते हैं, संदिग्ध परिस्थितियों या रिकॉर्ड में सिर्फ़ मामूली विसंगतियों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता, चाहे वे कितनी भी असुविधाजनक क्यों न लगें। कोर्ट ने यह भी कहा कि धोखाधड़ी का अनुमान नहीं लगाया जाना चाहिए, बल्कि इसे विशिष्टता के साथ पेश किया जाना चाहिए और ठोस व निर्विवाद सबूतों से साबित किया जाना चाहिए, जो इस मामले में मौजूद नहीं थे।
याची विजय कुमार यादव को 2014 में मऊ के एक जूनियर बेसिक स्कूल में सहायक अध्यापक के तौर पर नियुक्त किया गया। इस पद के लिए भर्ती प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले लागू नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार उसकी उम्मीदवारी पर विधिवत विचार किया गया। याचिकाकर्ता के पास पूर्व मध्यमा परीक्षा, उत्तर मध्यमा परीक्षा और शास्त्री डिग्री के असली प्रमाण पत्र थे, साथ ही बेसिक ट्रेनिंग सर्टिफिकेट और यूपी टीईटी योग्यता भी थी। हालांकि, 2018 में उसके शामिल शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की जानकारी मांगने के लिए आरटीआई आवेदन दायर किया गया। इसके बाद यह पता चला कि 1998 के उसके पुराने हाईस्कूल रिकॉर्ड में उसकी जन्मतिथि 2 जुलाई, 1984 दिखाई गई, जबकि 2001 के उसके पूर्व मध्यमा प्रमाण पत्र में यह 7 जुलाई, 1987 दर्ज थी।
इस कथित विसंगति के आधार पर मऊ के बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 27 जून, 2019 को उसे सेवा से बर्खास्त किया और उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया। इसे चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया और यह दलील दी कि याचिकाकर्ता ने किसी भी चरण पर उक्त हाई स्कूल सर्टिफिकेट पर न तो भरोसा किया और न ही उसे पेश किया। यह प्रस्तुत किया गया कि इसका उपयोग न तो बीटीसी ट्रेनिंग कोर्स, 2010 में दाखिला लेने के लिए किया गया, और न ही नियुक्ति के समय इसे जमा किया गया। इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि चूंकि याचिकाकर्ता को उक्त सर्टिफिकेट के आधार पर किसी भी समय कोई लाभ नहीं मिला, इसलिए बर्खास्तगी का आदेश पूरी तरह से अनुचित और कानूनी रूप से अस्थिर था। कोर्ट का कहना था कि किसी जानकारी का खुलासा न करना जिसे कदाचार माना जा सके उद्देश्यपूर्ण, सोची-समझी और धोखा देने के स्पष्ट इरादे से प्रेरित होना चाहिए। इस तरह के 'दुराशय' के अभाव में यह चूक ज़्यादा-से-ज़्यादा केवल एक अनियमितता ही मानी जाएगी, न कि कोई ऐसा दंडनीय कृत्य जिसके परिणामस्वरूप नियुक्ति रद्द करने जैसा दंड दिया जा सके। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता द्वारा जिन सर्टिफिकेटों पर भरोसा किया गया, उन पर कभी भी जाली या मनगढ़ंत होने का आरोप नहीं लगाया गया। कोर्ट ने कहा कि भले ही हाई स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज जन्म की तारीख को स्वीकार कर लिया जाए, तब भी याचिकाकर्ता संबंधित पद पर नियुक्ति के लिए निर्धारित पात्रता की सीमा के भीतर ही रहेगा। इस तरह कोर्ट ने कहा कि फ़ायदा या फ़ायदा की बुनियादी ज़रूरत, जो धोखाधड़ी का एक ज़रूरी हिस्सा है, इस मामले में पूरी तरह से गायब थी। कोर्ट ने कहा, "इसलिए कही गई गड़बड़ी से एम्प्लॉयर या मुकाबला करने वाले कैंडिडेट को कोई नुकसान नहीं होता है।" इस बारे में कोर्ट ने अशोक कुमार सिंह बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी 2024 में हाईकोर्ट के फ़ैसले पर बहुत ज़्यादा भरोसा किया, जिसमें यह कहा गया कि सिर्फ़ एक ऊंची या एडिशनल क्वालिफ़िकेशन जमा करना, जो न तो ज़रूरी है और न ही सिलेक्शन कमिटी ने अपॉइंटमेंट देने में इस पर भरोसा किया, अपने आप में धोखाधड़ी साबित नहीं करेगा।

