03 June 2026

‘बालपन की कविता’ पहल के तहत भारतीय कविताओं, गीतों और लोरियों का होगा संकलन

 

‘बालपन की कविता’ पहल के तहत भारतीय कविताओं, गीतों और लोरियों का होगा संकलन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप स्थानीय भाषाओं और लोक संस्कृति को बढ़ावा देने की पहल

लखनऊ। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों को आगे बढ़ाते हुए "Baalpan Ki Kavita Initiative: Restoring Bharatiya Rhymes/Poems for Young Children" कार्यक्रम शुरू किया गया है। इस संबंध में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), उत्तर प्रदेश ने सभी जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (DIET) तथा संबंधित संस्थानों को आवश्यक निर्देश जारी किए हैं।

जारी निर्देशों के अनुसार इस पहल का उद्देश्य देश की विभिन्न भारतीय भाषाओं और स्थानीय परंपराओं में प्रचलित गीतों, कविताओं एवं लोरियों का संकलन तैयार करना है। इससे प्रारंभिक स्तर के बच्चों को उनकी मातृभाषा और स्थानीय संस्कृति से जोड़ने के साथ-साथ शिक्षण को अधिक रोचक और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

SCERT द्वारा जारी पत्र में बताया गया है कि शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की ओर से प्राप्त निर्देशों के क्रम में सभी जिलों से स्थानीय भाषाओं में प्रचलित कम से कम 10 कविताएं, गीत अथवा लोरियां उपलब्ध कराने को कहा गया है। यह सामग्री क्षेत्र विशेष की संस्कृति, परंपरा और लोक जीवन को प्रतिबिंबित करने वाली होनी चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय लोकगीतों, बाल कविताओं और पारंपरिक लोरियों को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने से बच्चों के भाषा विकास, रचनात्मकता और सांस्कृतिक समझ को मजबूती मिलेगी। साथ ही नई पीढ़ी को भारतीय विरासत और लोक परंपराओं से परिचित कराने में भी यह पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार सभी जिलों से प्राप्त सामग्री का संकलन कर राष्ट्रीय स्तर पर एक समृद्ध संग्रह तैयार किया जाएगा, जिसका उपयोग प्रारंभिक शिक्षा में किया जा सकेगा।

प्रमुख बिंदु

🔹 "बालपन की कविता" पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप शुरू की गई।
🔹 स्थानीय भाषाओं की कविताओं, गीतों और लोरियों का संकलन होगा।
🔹 प्रत्येक जिले से कम से कम 10 रचनाएं भेजने के निर्देश।
🔹 बच्चों को भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं से जोड़ने का प्रयास।
🔹 प्रारंभिक शिक्षा को अधिक रोचक और मातृभाषा आधारित बनाने पर जोर।

यह पहल भारतीय ज्ञान परंपरा और स्थानीय भाषाई विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।