27 July 2026

69 हजार शिक्षक भर्ती: सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार का बड़ा रुख, नई मेरिट सूची के अभ्यर्थियों को भी नियुक्ति देने की तैयारी

 

उत्तर प्रदेश में परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापकों की भर्ती को लेकर चल रहे लंबे विवाद में राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विस्तृत लिखित प्रस्तुतियां दायर की हैं। यह मामला विशेष अनुमति याचिका संख्या 21273 ऑफ 2024 एवं संबंधित मामलों से जुड़ा है जिसमें रवि कुमार सक्सेना एवं अन्य याचिकाकर्ता तथा उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य प्रतिवादी हैं। 


राज्य सरकार के अनुसार एक दिसंबर 2018 के सरकारी आदेश से परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में 69 हजार सहायक अध्यापक पदों को भरने का अनुमोदन किया गया था। चयन प्रक्रिया उत्तर प्रदेश बेसिक एजुकेशन टीचर्स सर्विस रूल्स 1981 के अनुसार संचालित होनी थी जिसमें 2018 का 22वां संशोधन लागू था। इसके बाद छह जनवरी 2019 को एटीआरई 2019 परीक्षा आयोजित की गई। सात जनवरी 2019 के सरकारी आदेश से सामान्य वर्ग के लिए 65 प्रतिशत तथा आरक्षित वर्ग के लिए 60 प्रतिशत अर्हक अंक निर्धारित किए गए। इस आदेश को चुनौती दी गई थी परंतु उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने छह मई 2020 के निर्णय में इसकी वैधता को बरकरार रखा। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी 18 नवंबर 2020 के फैसले में राम शरण मौर्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में इस आदेश को सही ठहराया। 


एटीआरई 2019 का परिणाम 12 मई 2020 को घोषित हुआ जिसमें 4 लाख 31 हजार 466 अभ्यर्थी पंजीकृत हुए थे 4 लाख 9 हजार 530 ने परीक्षा दी और 1 लाख 46 हजार 60 अभ्यर्थी सफल घोषित हुए। राज्य ने एक जून 2020 को क्वालिटी पॉइंट मार्क सिस्टम के आधार पर 67 हजार 867 अभ्यर्थियों की चयन सूची जारी की। इसमें अनुसूचित जनजाति के 1133 पद अभ्यर्थियों की अनुपलब्धता के कारण खाली रह गए थे। 


उच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर की गईं। कुछ याचिकाओं में यह कहा गया कि मेधावी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को अनारक्षित रिक्तियों पर नियुक्ति नहीं दी गई बल्कि आरक्षित रिक्तियों पर ही नियुक्त किया गया। कुछ अन्य याचिकाओं में यह आपत्ति उठाई गई कि राज्य ने उन आरक्षित अभ्यर्थियों को माइग्रेशन की अनुमति नहीं देनी चाहिए थी जिन्होंने आरक्षित वर्ग के लिए पांच प्रतिशत की छूट लेकर टीईटी या एटीआरई 2019 में अर्हता प्राप्त की थी। सर्वोच्च न्यायालय के 18 नवंबर 2020 के फैसले के बाद सभी चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई और 67 हजार 867 व्यक्ति कार्यरत हैं। 


इसके बाद पांच जनवरी 2022 को अतिरिक्त 6800 अभ्यर्थियों की चयन सूची जारी की गई परंतु उच्च न्यायालय ने 27 जनवरी 2022 के अंतरिम आदेश से इसे रोक दिया जिसे खंडपीठ ने 15 मार्च 2022 के निर्णय में सही ठहराया। एकल न्यायाधीश ने 13 मार्च 2023 के निर्णय में कहा कि जो अभ्यर्थी आरक्षण के आधार पर एटीआरई 2019 में अर्ह हुए यानी 60 प्रतिशत से अधिक लेकिन 65 प्रतिशत से कम अंक प्राप्त किए वे केवल आरक्षित पदों पर ही नियुक्त होने के हकदार हैं और आरक्षण अधिनियम की धारा तीन उपधारा छह के तहत माइग्रेशन के हकदार नहीं हैं। एकल न्यायाधीश ने एक जून 2020 की चयन सूची को संशोधित करने तथा पांच जनवरी 2022 की सूची को रद्द करने का आदेश दिया। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि राज्य सरकार उन शिक्षकों के समायोजन के लिए नीति बनाए जो संशोधन के कारण बाहर हो सकते हैं। 


इस निर्णय के खिलाफ विशेष अपील संख्या 172 ऑफ 2023 समेत कई अपीलें खंडपीठ के समक्ष दायर की गईं। खंडपीठ ने 13 अगस्त 2024 के आक्षेपित निर्णय में एकल न्यायाधीश के फैसले को निरस्त करते हुए कई निर्देश जारी किए। इनमें कहा गया कि राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकारी एटीआरई 19 के आधार पर सर्विस रूल्स 1981 के परिशिष्ट एक के अनुसार 69 हजार अभ्यर्थियों की नई चयन सूची तैयार करें और एक जून 2020 तथा पांच जनवरी 2022 की सूचियों को नजरअंदाज करें। सूची तैयार करने के बाद सर्विस रूल्स के नियम 14 के तहत क्वालिटी पॉइंट के आधार पर आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा तीन उपधारा छह के अनुसार आरक्षण नीति अपनाई जाए। यदि कोई आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी सामान्य वर्ग के बराबर मेरिट प्राप्त कर ले तो उसे सामान्य वर्ग में माइग्रेट किया जाए। लंबवत आरक्षण को क्षैतिज आरक्षण के आगे झुकना होगा। यदि कोई कार्यरत अभ्यर्थी प्रभावित होता है तो छात्रों को नुकसान न हो इसलिए उन्हें सत्र लाभ दिया जाए। एकल न्यायाधीश के निर्देशों को तदनुसार संशोधित माना जाए और पूरी प्रक्रिया तीन महीने में पूरी की जाए। 


इस निर्णय से व्यथित होकर कई अभ्यर्थियों ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर कीं जिनमें वे लोग भी शामिल थे जिन्हें सूची दोबारा बनाने से बाहर होने का डर था। नौ सितंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका दायर करने की अनुमति दी नोटिस जारी किए जो 23 सितंबर 2024 को लौटाए जाने थे। याचिकाओं को सुनवाई और अंतिम निपटारे के लिए सूचीबद्ध किया गया। पक्षकारों के लिए नोडल अधिवक्ता नियुक्त किए गए तथा 20 सितंबर 2024 तक प्रस्तुतियां दाखिल करने का निर्देश दिया गया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी राज्य की ओर से उपस्थित हुईं। इस बीच खंडपीठ के निर्देशों के अनुसार सूची दोबारा बनाने की प्रक्रिया को रोक दिया गया। 


इसके बाद चार फरवरी 2026 को हुई कार्यवाही में राज्य सरकार ने विचार करके प्रस्तुतियां दीं जिन्हें 19 मई 2026 के आदेश में दर्ज किया गया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि राज्य उत्तर प्रदेश चार फरवरी 2026 के आदेश में निहित अनुरोध को स्वीकार करते हुए इस मामले की विशेष परिस्थितियों में उन अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर विचार करने के लिए तैयार और इच्छुक है जो उच्च न्यायालय के 13 अगस्त 2024 के निर्णय और आदेश के अनुसार दोबारा तैयार चयन सूची में शामिल होने योग्य होंगे। यह मौजूदा रिक्तियों की उपलब्धता अभ्यर्थियों द्वारा न्यूनतम योग्यताएं पूरी करने तथा इस प्रक्रिया को भविष्य के मामलों में मिसाल न माने जाने की शर्तों के अधीन होगा। न्यायालय ने राज्य के निर्णय की सराहना करते हुए छह सप्ताह का समय दिया स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा तथा 21 जुलाई 2026 को नियमित पीठ के समक्ष मामले को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। विशेष अनुमति याचिकाओं और संबंधित आवेदनों को पार्ट हर्ड नहीं माना जाएगा। 


19 मई 2026 के आदेश के बाद राज्य अधिकारियों ने खंडपीठ के 13 अगस्त 2024 के निर्णय के अनुसार मेरिट सूचियों को दोबारा तैयार करने का विस्तृत अभ्यास किया है। इस संबंध में 20 जुलाई 2026 को शपथपत्र दाखिल किया गया है जिसमें बताया गया है कि राज्य पहले से नियुक्त व्यक्तियों को बिना प्रभावित किए संशोधित मेरिट सूची में स्थान पाने वाले अन्य व्यक्तियों को समायोजित करने के अपने वक्तव्य के अनुसार प्रक्रिया पूरी कर चुका है। यह मौजूदा रिक्तियों की उपलब्धता अभ्यर्थियों द्वारा न्यूनतम योग्यताएं पूरी करने तथा इस अभ्यास को भविष्य के मामलों में मिसाल न माने जाने की शर्तों के अधीन है। राज्य ने न्यायालय के समक्ष विनम्रतापूर्वक निवेदन किया है कि वह इस मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों में न्यायालय द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों के अनुसार उक्त प्रस्तुतियों का पालन करने के लिए तैयार है। 


ये लिखित प्रस्तुतियां 27 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में राज्य के अधिवक्ता अंकित गोयल द्वारा दाखिल की गई हैं।

अविचल 


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