प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि कनिष्ठ सहायक पद पर पदोन्नति के लिए टाइपिंग टेस्ट को अनिवार्य योग्यता मानते हुए इसे पहले लेना नियम विरुद्ध नहीं है। न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने गोरखपुर कलेक्टर के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों अशोक कुमार व अन्य की याचिका खारिज करते हुए कहा कि 2014 सेवा नियमों के तहत टाइपिंग गति न्यूनतम योग्यता है, इसलिए विभाग ने सही प्रक्रिया अपनाई।
याचीगण अशोक कुमार, रुद्रभान तिवारी, सत्यवान पाठक समेत आठ कर्मचारियों ने मांग की थी कि 2001 के पदोन्नति नियम 8(2) के तहत पहले लिखित परीक्षा, साक्षात्कार और चरित्र पंजिका का मूल्यांकन हो, उसके बाद टाइपिंग टेस्ट कराया जाए। याचियों का कहना था कि विभाग ने आठ दिसंबर 2017 को सीधे टाइपिंग टेस्ट करा लिया, जिसमें वे 25 शब्द प्रति मिनट की गति नहीं ला सके और चयन से बाहर हो गए। बाद में पांच, छठ, सात और आठवें प्रतिवादी पदोन्नत कर दिए गए।
याचियों के अधिवक्ता महेश शर्मा ने दलील दी कि टाइपिंग टेस्ट तभी होना चाहिए, जब पद के लिए टाइपिंग अनिवार्य हो और वह भी अंतिम चरण में। राज्य की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता राजीव गुप्ता तथा प्रत्यर्थियों की ओर से अधिवक्ता विष्णु स्वरूप श्रीवास्तव ने 2014 के यूपी सरकारी विभागीय लिपिकीय संवर्ग सेवा नियमों का हवाला दिया।
कोर्ट ने पाया कि 2014 नियमों के नियम 10 के अंतर्गत कनिष्ठ सहायक के लिए हिंदी में 25 और अंग्रेजी में 30 शब्द प्रति मिनट टाइपिंग तथा ट्रिपल सी प्रमाणपत्र अनिवार्य है। पीठ ने कहा कि टाइपिंग न्यूनतम पात्रता है और इसकी जांच पहले कर लेना तर्कसंगत है।

