31 August 2026

मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूं, सबसे ज्यादा पाया...’आईएएस दिव्या मित्तल ने लिखा, आज आभार से आंखें नम हैं


● आईएएस दिव्या मित्तल ने 13 वर्ष बाद नौकरी को अलविदा कहा, पोस्ट कर साझा किया दर्द


● मिर्जापुर की एक प्रभावशाली नेता से तकरार की भी चर्चा, चुनाव लड़कर दे सकती हैं टक्कर



लखनऊ, विशेष संवाददाता। आईएएस दिव्या मित्तल सेवा के दौरान जैसे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती थी वैसे ही उन्होंने इस्तीफा देने के लिए भी इसी का इस्तेमाल किया। उन्होंने रविवार की सुबह 7.52 बजे पोस्ट किया, जिसमें लिखा ‘आज मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए आईएएस से त्यागपत्र दे दिया है। मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूं। सच यह है कि सबसे ज्यादा मैंने ही पाया और वो कर्ज और भी बढ़ता गया।


दिव्या ने लिखा, आज आभार से आंखें नम हैं। बस एक दृश्य इनमें बसा है। लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध मां, जो अपने गांव में पहली बार पानी पहुंचता देख कुछ नहीं बोली, बस कांपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा। और वह सपना भी नहीं छूटेगा, जो देश की इस मिट्टी ने मुझे दिया है। लिखा कि लोग मेरी खुशी में मुझसे ज्यादा खुश हुए। उन्होंने मुझे तब भी उसी विश्वास से देखा, जब मैं खुद ही थकी या टूटी थी। और इसी ने आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी। इतना प्यार, इतना सम्मान, इतना अपनापन मिला कि मेरी झोली पूरी भर गई। साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे, सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बैंगलोर से पढ़ने के बाद, लंदन में नौकरी लग गई। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। सो लौट आई, और आईएएस अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला।


लहुरिया दह में पानी के साथ खुशी के आंसू : दिव्या ने इसके ठीक 59 मिनट बाद 8.11 बजे फिर एक पोस्ट डाला। उन्होंने लिखा आज मेरा दिल भरा हुआ है और मैं भावनाओं से ओत-प्रोत हूं। लहुरिया दह में पानी बह रहा है और मेरी और वहां के लोगों की आंखों से भी खुशी के आंसू बह रहे हैं। आजादी के 75 साल बाद भी, मिर्जापुर के लहुरिया दह गांव के लोगों के पास पानी की सुविधा नहीं थी। यूपी-एमपी बॉर्डर पर पहाड़ी की चोटी पर बसे होने के कारण, वहां पानी पहुंचाने की हर कोशिश ‘नामुमकिन’ लगती थी। जब मैं पहली बार वहां गई, तो गांव वालों के सामने अपनी पानी की बोतल से पानी पीने की हिम्मत नहीं हुई। टैंकरों से पानी देने के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल किया जाता था। लोग अपनी बेटियों की शादी इस गांव में नहीं करते थे।


दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर जिले में डीएम रहते हुए कई ऐसे काम किए जिससे उनकी काफी सराहना हुई। एक चर्चा मिर्जापुर की एक प्रभावशाली नेता से उनके तकरार की भी है। उनके इस्तीफे के बाद यह भी चर्चाएं चल रही है कि शायद दिव्या मिर्जापुर से चुनाव लड़कर उन्हें टक्कर दें। अंदरखाने में यह भी चर्चा है कि दिव्या राजस्व जैसे कम महत्वपूर्ण विभाग में विशेष सचिव बनाए जाने से भी नाराज चल रही थीं।


उनके करीबियों का कहना है कि दिव्या कारपोरेट सेक्टर की नौकरी छोड़कर प्रशासनिक सेवा में इसलिए आई थीं कि वह जनता की सेवा कर सकेंगी और यह तभी संभव था, जब वे जिलों में डीएम रहे। उनका मानना था कि जिस उम्र में फील्ड में काम कर जनता की सेवा की जा सकती है, उस समय उन्हें शासन में बैठा दिया गया। दिव्या मित्तल ने आईआईटी दिल्ली से बीटेक और आईआईएम बेंगलुरु से पीजीडीएम किया है। 26 नवंबर 2015 को उनका मंसूरी में प्रशिक्षण पूरा हुआ। इसके बाद 27 नवंबर 2015 को मेरठ में उन्हें पहले नियुक्ति संयुक्त मजिस्ट्रेट के पद पर मिली। गोंडा में वह मई 2017 में मुख्य विकास अधिकारी बनाकर भेजी गईं। दिव्या कानपुर में संयुक्त महाप्रबंधक यूपीएसआईडीसी और बरेली विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष फरवरी 2019 में बनाई गईं। संतकबीरनगर, मिर्जापुर और देवरिया की डीएम रहने के बाद उन्हें मई 2026 में विशेष सचिव राजस्व परिषद बनाकर भेजा गया।


गुरु पूर्णिमा पर युवाओं को प्रेरित करने का दिया था संदेश

लखनऊ। आईएएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा से इस्तीफा देने वाली दिव्या मित्तल अपने काम के साथ मुखर विचारों को लेकर भी बेबाक राय रखती हैं। जिलाधिकारी पद पर तैनाती के दौरान गरीबों के बीच घुलमिल जाना, उनके दुखदर्द में भागीदार बनना उनके कामकाज का हिस्सा रहा। जहां भी तैनात रहीं, स्थानीय लोगों की उम्मीद बनीं। जनता से जुड़ी समस्याएं सुनना, उनके स्थायी समाधान और कामकाज में पारदर्शिता ने उन्हें ख्याति दिलाई। गुरु पूर्णिमा पर उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए संदेश दिया था। गुरु पूर्णिमा पर 29 जुलाई को एक लंबी पोस्ट साझा की। इसमें लिखा कि इंसानी इतिहास में हम सबसे ज्यादा ‘जानकारी रखने वाली’ पीढ़ी है, लेकिन सीखने के मामले में हम सबसे बुरे हैं। समस्या गुरुओं की कमी नहीं, बल्कि सीखने की इच्छा या काबिलियत की है। उन्होंने सीखने की चार कला का भी उल्लेख किया। लिखा कि कोई जीरो डे (बिना कुछ सीखे दिन गुजारना) नहीं, अपनी हार से सीखें, सीखने में अहंकार की कोई जगह नहीं, पूरी जिम्मेदारी लें। युवाओं को संदेश देते हुए लिखा कि ‘जीरो’ एक नंबर नहीं है, यह एक आदत है और एक बार बुरा सिलसिला शुरू हो जाए तो उसे तोड़ना मुश्किल होता है। गति बनाए रखें, तेजी से काम करने के बजाय लगातार काम करना ज्यादा असरदार होता है।


सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है

दिव्या लिखती हैं कि बहुत कुछ करने का मौका मिला और बहुत सीखा। देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मिर्जापुर ने सिखाया कि ‘असंभव’ कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है और मां विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। इस जीवन का असली सुकून उन आंखों में दिखा, जिस परिवार को पहली बार जमीन का हक मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला और जिस किसान के खेत को पानी मिला। उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फाइल के पीछे एक व्यक्ति है, और उसकी गरिमा बनाए रखना ही न्याय है।