28 August 2026

सरकारी स्कूलों की कमियां दिखाइए, लेकिन शिक्षा व्यवस्था को तमाशा मत बनाइए: कैमरे से नहीं, सुधार से बदलेगी तस्वीर

 सरकारी विद्यालयों में कमियां हैं तो उन्हें सामने आना चाहिए। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति यह नहीं चाहेगा कि विद्यालयों की समस्याओं पर पर्दा डाल दिया जाए। स्कूल बेहतर हों, संसाधन बढ़ें, शिक्षक बेहतर वातावरण में काम करें और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, इससे भला किसे आपत्ति हो सकती है? असली सवाल कमियां दिखाने का नहीं, उन्हें दिखाने के तरीके का है।



आजकल एक नई किस्म की स्कूल पत्रकारिता दिखाई दे रही है। कैमरा उठाइए, विद्यालय में प्रवेश कीजिए, कक्षा में चले जाइए, शिक्षक के सामने माइक कर दीजिए, बच्चों से नकारात्मक सवाल पूछिए और फिर कुछ मिनट के वीडियो को पूरी शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर बताकर सोशल मीडिया पर परोस दीजिए। कैमरा चालू होते ही विद्यालय निरीक्षण स्थल से अधिक राजनीतिक रंगमंच जैसा दिखाई देने लगता है।


यहां सबसे पहले विद्यालय के शिक्षण वातावरण को समझना होगा। कक्षा केवल चार दीवारों, ब्लैकबोर्ड और बच्चों की उपस्थिति का नाम नहीं है। वह एक मनोवैज्ञानिक वातावरण है, जिसमें शिक्षक और बच्चे के बीच विश्वास, संवाद, एकाग्रता और सीखने की निरंतरता बनती है। उस वातावरण में अचानक चार-पांच बाहरी लोग कैमरा और माइक लेकर घूमने लगें तो स्वाभाविक है कि पूरी व्यवस्था प्रभावित होगी।


जिस शिक्षक से अपेक्षा की जाती है कि वह बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करे, उसके सामने अचानक कैमरा तान दिया जाए तो उसकी सहजता प्रभावित होगी। जिस बच्चे को बोलने में झिझक होती है, उसके सामने कैमरा लगाकर पूछा जाए कि "तुम्हें स्कूल में क्या नहीं मिलता?" तो यह शैक्षिक संवाद कम और पूर्वनिर्धारित नकारात्मक कथा के लिए सामग्री जुटाना अधिक है। कैमरे के सामने बच्चे भी स्वाभाविक नहीं रहते और शिक्षक भी।


चार-पांच बाहरी लोग यदि अलग-अलग कक्षाओं में घूम रहे हों तो बच्चे पढ़ाई करेंगे या कैमरे देखेंगे? शिक्षक पाठ पूरा करेगा या आगंतुकों के सवालों का जवाब देगा? प्रधानाध्यापक विद्यालय चलाएगा या अचानक आए लोगों को संभालेगा? एक पीरियड में बच्चों के सीखने के लिए निर्धारित समय का हिस्सा यदि इस गतिविधि में चला गया तो फिर उसी दिन यह निष्कर्ष निकालना कि विद्यालय में पढ़ाई प्रभावित है, एक अजीब विडंबना होगी।


इसलिए निरीक्षण और हस्तक्षेप के बीच अंतर समझना जरूरी है। शिकायत का अधिकार है, लेकिन शिक्षण प्रक्रिया बाधित करने का अधिकार नहीं। जवाबदेही मांगना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन किसी के मुंह में माइक घुसेड़ देना जवाबदेही की अनिवार्य शर्त नहीं है। विद्यालय सार्वजनिक संस्था है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वहां प्रवेश, रिकॉर्डिंग और बच्चों से बातचीत के लिए कोई मर्यादा ही न हो।


उत्तर प्रदेश के सरकारी विद्यालयों की स्थिति पर बात करते समय एक दूसरी ईमानदारी भी जरूरी है। पिछले वर्षों में विद्यालयों को मिलने वाले संसाधनों और सुविधाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कभी जहां पांच-दस हजार रुपये के सालाना संसाधनों में विद्यालय को किसी तरह चलाना पड़ता था, वहां आज कई विद्यालयों में लाखों रुपये तक की विभिन्न मदों में धनराशि और अनेक सुविधाएं उपलब्ध हैं। भवन, फर्नीचर, बिजली, शौचालय, पेयजल, शिक्षण सामग्री और डिजिटल संसाधनों में सुधार हुआ है। यह कहना कि सरकारी विद्यालयों में कुछ बदला ही नहीं, वास्तविकता को एकतरफा देखना होगा।


हां, इसके साथ समस्याएं भी बढ़ी हैं। डिजिटलीकरण, पोर्टल, फोटो अपलोड, ऑनलाइन सूचनाएं और दस्तावेजीकरण ने शिक्षक के काम को कई स्तरों पर जटिल किया है। इस पर सवाल उठने चाहिए और सुधार भी होना चाहिए। लेकिन सुधार की गुंजाइश का अर्थ यह नहीं कि विद्यालयों में हुए सकारात्मक बदलावों को पूरी तरह नकार दिया जाए और यदि विद्यालय को और बेहतर बनाना है तो उसके लिए संस्थागत रास्ते मौजूद हैं। विद्यालय प्रबंध समिति है, अभिभावक हैं, ग्राम समुदाय है, शिक्षा विभाग है और अधिकारी हैं। शिकायत कीजिए, प्रमाण दीजिए, जांच कराइए, जिम्मेदारी तय कराइए और सुधार कराइए। यह रास्ता धीमा हो सकता है, लेकिन यही स्थायी सुधार का रास्ता है। सोशल मीडिया की अदालत त्वरित फैसला तो दे सकती है, शिक्षा व्यवस्था नहीं चला सकती।


यहां एक और असहज सवाल उठना चाहिए। सरकारी विद्यालयों में उपलब्ध सुविधाओं की चोरी और तोड़फोड़ कई जगह उसी स्थानीय समाज के लोग करते हैं जिसके बच्चों के लिए वे सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। कहीं नल गायब होता है, कहीं बिजली का सामान, कहीं फर्नीचर टूटता है, कहीं शौचालय क्षतिग्रस्त कर दिया जाता है। तब कितने कैमरे उन घरों की ओर घूमते हैं? कितने वीडियो इस सवाल के साथ सामने आते हैं कि सरकार ने सुविधा दी थी, समाज ने उसे बचाया क्यों नहीं?


एक प्रश्न असमानता का भी है। क्या यही वीडियोबाज किसी महंगे निजी विद्यालय में इसी निर्भीकता से अचानक कैमरा लेकर प्रवेश कर सकते हैं? क्या वहां किसी कक्षा में घुसकर शिक्षक के चेहरे पर माइक रख सकते हैं? क्या वहां बच्चों से बिना अनुमति रिकॉर्डिंग कर सकते हैं? यदि नहीं, तो सरकारी विद्यालय को आसान निशाना समझना केवल शिक्षा व्यवस्था की आलोचना नहीं, बल्कि संस्थागत असमानता का भी संकेत है।


सरकारी विद्यालय का शिक्षक पहले से सामाजिक अपेक्षाओं, प्रशासनिक दायित्वों, गैर-शैक्षणिक कार्यों और बढ़ते डिजिटल अनुपालन के बीच काम कर रहा है। उससे जवाबदेही मांगिए, उसके काम का मूल्यांकन कीजिए, गलती पर कार्रवाई कीजिए; लेकिन ऐसा वातावरण मत बनाइए जिसमें वह हर समय इस आशंका में रहे कि किसी दिन कोई कैमरा अचानक सामने आकर कुछ सेकंड की रिकॉर्डिंग से उसकी पूरी पेशेवर पहचान तय कर देगा।


सबसे गंभीर है इस पूरी प्रक्रिया को राजनीतिक समर्थन मिलना। विद्यालय की एक वास्तविक कमी को व्यवस्था सुधार का मुद्दा बनाने के बजाय उसे तत्काल राजनीतिक कंटेंट में बदल देना शिक्षा के सरोकार को पीछे धकेल देता है। शिक्षा सुधार कैमरे के सामने शिक्षक को कठघरे में खड़ा करने से नहीं होगा। उसके लिए नीति, संसाधन, प्रशिक्षण, प्रशासनिक सुधार और सामाजिक सहभागिता की जरूरत होगी।


शिक्षा में सुधार भय से नहीं, विश्वास से होता है। निरीक्षण का उद्देश्य शिक्षक को अपमानित करना नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए। प्रश्न ऐसा होना चाहिए जो समाधान की ओर ले जाए, न कि ऐसा जो पहले से तय निष्कर्ष के लिए प्रमाण तलाशे। बच्चे की आवाज सुनी जानी चाहिए, लेकिन उसकी कक्षा और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा की कीमत पर नहीं।


सरकारी विद्यालय जनता के हैं, इसलिए जनता को उनकी चिंता करने का पूरा अधिकार है। लेकिन जनता के होने का अर्थ यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति कभी भी कक्षा में घुसकर शिक्षण प्रक्रिया रोक दे। लोकतंत्र अधिकार देता है, साथ ही मर्यादा भी मांगता है। कमियां दिखाइए, लेकिन स्कूल को सुधारने के लिए। शिक्षक से सवाल कीजिए, लेकिन उसे अपमानित करने के लिए नहीं। बच्चे की आवाज सुनिये, लेकिन उसकी कक्षा छीनकर नहीं। व्यवस्था पर सवाल उठाइए, लेकिन स्वयं अव्यवस्था पैदा करके नहीं।


अंततः सवाल यह नहीं है कि सरकारी स्कूल में कमी है या नहीं। सवाल यह है कि उस कमी को दूर करने की हमारी नीयत कितनी ईमानदार है। यदि नीयत सचमुच शिक्षा सुधारने की है तो कैमरा विद्यालय के भीतर घुसने से पहले विवेक के भीतर जाना चाहिए। वरना कैमरा बहुत कुछ दिखा सकता है, लेकिन शिक्षा को समझ नहीं सकता।(जय हिन्द, जय शिक्षा )🙏